Showing posts with label जिंदगी. Show all posts
Showing posts with label जिंदगी. Show all posts

Thursday, 17 March 2016

बचपन के रंग

आजकल होली की धूम मची हुई है। गुझिया, चिप्स और मिठाइयाँ सबकी तैयारियाँ शुरू हो गयी हैं। बहू आज ही सुबह कह रही थी  माँ बाजार में सब मिल जाता है फिर आप इतनी मेहनत क्यों करते हो? कैसे बताऊँ उसको की पहले तो कई दिनों पहले से घर में उत्सव जैसा लगने लगता था, साँझा परिवार होने की वजह से हर काम लार्ज स्केल पर होता था। चिप्स बनते तो सारी छत पर चादरें बिछा कर चिप्स सूखने डालना, माँ का हुक्म होता था सभी चिप्स अच्छी तरह से फैलाना। निगरानी रखना की चिड़िया चोंच न मार जाये, चुन्नी से ढक देना मिट्टी न पड़ जाए। आजकल तो थोड़ा सा बस शगुन करने जितना ही सामान बनाया जाता है। 

खैर मुझे तो होली का नाम आते ही बचपन की वो ढेर सारी घटनाएँ ऐसे याद आ जाती हैं मनो कल ही की तो बात है। उस बार भैया की बोर्ड की परीक्षाएं थीं, माँ पिताजी का सख्त हुक्म था कोई होली वोली नही होगी। उसका ध्यान भी भंग होगा, कंसंट्रेट नही कर पायेगा। अच्छे नंबर लाने है उसे। "पर।", "कोई पर वर नही, कह दिया न"।और हम सब छोटे बच्चे डर के मारे एक कोने में छुप कर खुसर फुसर करने लगे। "ये भी कोई बात हुई, जैसे और किसी के पेपर नही होते। पता नही बड़े भैया ऐसे कौन से महान पेपर देने वाले है।" हम सबको यही लगने लगा था की माँ का तो पहले ही लगता था पिताजी भी बड़े भैया को हम सबसे ज्यादा प्यार करते है। इस बार की होली सूखी  ही जाने वाली है। बस इतना सा रिएक्शन था बच्चों का........

सुबह सुबह पापा ने थोड़ा सा टीका कर होली का शगुन किया । होली मुबारक कह कर हम सबके माथे पर होली का टीका लगाया। और अपने कमरे में चले गए। और तभी दरवाजे पर बेल बजी, खोला तो छोटी बुआ रंगो के थैले हाथ में ले कर, मिठाई की टोकरी के साथ घर में घुसीं। "क्या त्यौहार के दिन भी दरवाजे बंद कर रखे है? बच्चे कहाँ हे सारे? कर्फ्यू क्यों लगा रखा हे घर में ???" "बुआ वो पिताजी ने होली खेलने से मना किया है, भैया के बोर्ड्स है न।""अरे हटो! पूरा साल इस त्यौहार का इन्तज़ार करते हैं", कहते कहते बुआ बाथरूम में घुस गयी। पानी की बाल्टी उठाई और जा पहुंची भैया के कमरे में, "विमल बाहर आता है या यही से बाल्टी से होली खेलनी है?" और हम सब बच्चे डर के मारे पिताजी के कमरे की तरफ देख रहे थे की अभी पिताजी बाहर आएंगे और बम  फूटेंगे। "सुन रहा है तू या मैं अंदर आ जाऊँ?" "बुआ वो पिताजी..." और तब तक बुआ जी ने भैया को बाहर खींचा और रंग के पानी से सरोबार कर दिया। हम सब ख़ुशी के मारे चिल्लाने लगे और एक दूसरे को रंग मलने लगे। शोर सुन कर पिताजी गुस्से में कमरे से बाहर आये। बुआजी ने पीछे से गुलाल उनके ऊपर पलट दिया। बुरा न मानो होली है। सबकी हिम्मत बड़ गयी, कोई बुआ की आड़ लेकर गुलाल उड़ा रहा था, कोई मग से ही पानी दूसरे पर डाल रहा था।

"क्या भैया, ये क्या? पूरा साल पढाई की है। विमल के १ -२ घंटे होली खेलने से उसके नम्बर कम नही होंगे। सब बच्चों का मुँह देखो कैसे खिल गया है। विमल भी देखो कितना एन्जॉय कर रहा है। आपको क्या लगता है जब उसके सारे फ्रेंड्स होली खेल रहे है तो उसका मन पढाई में लगेगा?" "जा बेटा, थोड़ी देर बाहर खेल लो।"

वो तो बाद में पता चला कि माँ ने बुआ को होली पर लगे कर्फ्यू के बारे में बताया था और हमारे उतरे चेहरों के बारे में भी। वो जानती थी की सिर्फ बुआ ही हमे इस कर्फ्यू से रिलीज़ करवा सकती थी। उन्ही की बदौलत हमारी सुखी, खुश्क, बेमजा होली सबसे ज्यादा रंगीन, गीली और खुशगवार होली में बदल गयी। "थैंक्यू बुआ" कह कर हम सब बुआ से लिपट गए। मन ही मन सोच रहे थे की हमने अपने मन में बेकार ही ये सोच बना ली थी की माँ भैया को ज्यादा प्यार करती है, माँ के लिए तो सभी बच्चे बराबर और सबके लिए उसका प्यार बराबर। 

"थैंक्यू माँ" अनायास ही मेरे मुँह से निकला। "क्या?" पति के इस प्रश्न पर मै वर्तमान में आ गयी। कुछ नही कह कर मुस्कुरा दी।


I’m pledging to #KhulKeKheloHoli this year by sharing my Holi memories atBlogAdda in association with Parachute Advansed.


Tuesday, 1 March 2016

वो एक दिन...!

आज सुबह से ही तबियत कुछ ढीली सी लग रही थी। क्लास मे भी खड़े रह कर पढ़ाना और फिर एग्जाम का प्रेशर बच्चों को बार बार प्रैक्टिस टेस्ट देना, लग रहा था कि शरीर में अब और ताकत नही बची कि घर जाकर कुछ कर पाऊँगी। जैसे तैसे स्कूल में छुट्टी की घंटी बजी और मैं घर जाने की जल्दी में निकली।

    बाहर निकलते  ही रिक्शा मिला शुक्र मनाया नही तो कई बार तो रिक्शा के इंतजार में ही दस पंद्रह मिनट लग जाते हैं। रिक्शा पर बैठते ही घर की वस्तु स्थिति सामने घूमने लगी मेरे स्कूल चले जाने के बाद पतिदेव ने नहा कर तौलिया वहीं छोड़ दिया होगा। किचेन अंदर घुसते ही मुंह चिढ़ाती सी प्रतीत होती है जैसे वो भी इसी इंतजार मैं बैठी होकि अभी मैडम आएँगी तो मुझेभी साफ सफाई करके मेरी रौनक वापिस लायेंगी। और उधर मैले कपडे जिन्हे सुबह जल्दबाज़ी में छोड़ आई थी की दिन में आ कर देखूंगी आँखों के अँधेरा छा रहा था। चलो पहले घर तो पहुँच जाऊँ फिर देखी जाएगी क्या करूंगी। "मैडम किधर जाना है"आवाज़ से तन्द्रा भंग हुई। "सीधे हाथ मोड़ कर रोक देना भैया, धन्यवाद"।

    पर्स में से चाबी निकलने लगी तो याद आया आज तो बेटा घर पर है कल ही तो आया है बनारस से, वो हॉस्टल में रहता है कभी कभार लॉन्ग वीकेंड हो तो आ जाता है। घंटी बजते ही बेटे ने दरवाजा खोला उसका मुस्कुराता चेहरा देख कर आधी थकान तो वैसे ही उतर गयी। "उठ गया बेटा?  कुछ खाया तूने? मैं जल्दी से कुछ बना देती हूँ अभी", पर्स रखते हुए बोली। मेरी आँखों को खुद पर यकीं नही आ रहा हो जैसे ऐसे खुली की खुली रह गयी। कमरा एकदम साफ, बिस्तर करीने से लगा हुआ, शीट्स तह कर के रखी हुई। "ये क्या आज तूने बिस्तर सम्हाले?" "हाँ जी, क्यों?" बेटे ने बड़ी हैरानी से पूछा। मैं हैरान सी आँखों से उसे देख रही थी बाहर देखा तो कपडे सूख रहे थे अब तो मुझे लगा  सपना देख रही हूँ।

        मुझे यकीं नही हो रहा था क्योंकि मेने तो बेटे को कभी काम करते नही देखा था और हमारे घर के रिवाजों के हिसाब से लड़के काम नही करते। कभी आधी रात में पानी भी चाहिए हो आवाज़ लगा कर मांगने वाला बच्चा आज माँ के सारे काम कर दे, ये तो बिलकुल ही अप्रत्याशित सा था। मैं कुछ कहती इससे पहले वही बोला "मम्मी, आप इतनी हैरान क्यों हो रही हो? अब मैने हॉस्टल में जाने के बाद इस चीज़ को समझा कि आप हमारे सारे काम कितनी सहजता से कर लेती। आप तो कभी ये भी नही कहते कि मैं थकी हूँ मैं नही करुँगी। पर मै जब क्लास से वापिस रूम पर आता था तो फैला बिस्तर, कपडे सब सम्हालने की हिम्मत भी नही होती थी। फिर मेने फैसला किया की सुबह ही सब ठीक कर लिया करूँगा।"

      " मुझे आपकी बहुत याद आती थी। साथ ही मन में ये बात भी कि मम्मी ने क्यों नही हमसे कभी काम करने को कहा अकेली ही सब कुछ करती रहीं। आपने मुझे पापा को क्यों नही कहा कि आप भी थक जाते हो हमें भी आपका हाथ बंटाना चाहिये। अब वक़्त बदल चुका है माँ जब आप हमारे लिए बाहर जाकर काम कर सकते हो तो हमे भी तो घर के कामों में आपकी हेल्प करनी चाहिए। अबसे हम सब मिल कर घर के और बाहर के सब काम करेंगे घर के काम सिर्फ आपकी जिम्मेदारी नही है माँ।"

    और मैं, मैं तो जैसे आकाश में  उड़ रही थी। जिंदगी भर तो यही सुनती रही जितना मर्जी पढ़ ले घर के काम तो तुझे करने ही पड़ेंगे मर्द थोड़ी घर का काम करते अच्छे लगते हैं। और आज मेरा बेटा मुझे ये एहसास करवा रहा है कि जब वर्क प्लेस पर हम सब एक समान हैं तो घर में क्यों नही। आसमान की तरफ देखते हुए बुदबुदा रही थी ईश्वर तेरे भी खेल न्यारे हैं कब क्या कर दे कुछ पता नही। 

I am joining the Ariel #ShareTheLoad campaign at BlogAdda and blogging about the prejudice related to household chores being passed on to the next generation.


Wednesday, 21 October 2015

अध्यापिका की ज़ुबानी...!

"माँ जन्म देती है गुरु जीवन देता है", टीचर्स डे पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने स्टूडेंट्स के साथ बातचीत में  जब ये वाक्य कहा तो लगा कि शायद गुरु शिष्य की परम्परा को फिर से जीवन मिलने वाला है। अगर हमारे देश के प्रधान मंत्री टीचर्स की रिस्पेक्ट करने की बात कर रहे हैं तो जरूर मआशरे में भी यही सन्देश जायेगा और हम जो टीचर्स अपनी खोयी हुई इज़्ज़त के साथ भी अपनी ड्यूटी को पूरी शिद्दत के साथ निभाते जा रहे हैं, थोड़ी बहुत कद्र हमारी भी समाज में हो जाएगी।

ऐसा नही है कि आज हर कोई टीचर कम्युनिटी के अगेंस्ट है आज भी बहुत से बच्चे अपने टीचर को इज़्ज़त देते है गुरु की कही हर बात उनके लिए मायने रखती है। पर ज्यादा संख्या अब उनकी होती जा रही हे जो ये समझते है कि पहले सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती थी अब नही होती या अब  टीचर्स को सैलरी तो ज्यादा मिलती है काम नही करते।   जबकि तब भी टीचर अपनी जॉब को ईशवंदना की तरह ईमानदारी से करता था आज भी वह उसी ईमानदारी के साथ अपने काम को पूजा की तरह से कर रहे है। 

पता नही क्यों सरकार खराब रिजल्ट आने पर टीचर्स पर सारा बलेम डाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। वही टीचर जो सारी जिंदगी बच्चों को शिक्षा देता रहा आज से कुछ ही साल पहले की बात है जब सरकारी स्कूल के पढ़े  बच्चे अच्छे कॉलेज में एड्मिशन लेते थे डॉक्टर्स ,इंजीनियर्स और बड़ी बड़ी पोस्ट होल्डर्स होते थे फिर आज अचानक वही टीचर निष्कर्मण्य कैसे हो गया क्या वो पढ़ाना भूल गया या पढाई इतनी मुश्किल हो गयी की अब वो पढ़ा नही पा रहा आखिर ऐसा हो क्या गया।

आज जो पॉलिसीज लागू की गयी है वो बच्चों में पढाई को महत्व न देते हुए ये सोचने लगे है कि जब फेल तो हो नही सकते तो क्यों मेहनत करनी वो बच्चे जो कल तक फर्स्ट आने के लिए या १०० में से १०० नंबर पाने के लिए मेहनत करते थे वो अपने साथ E1 ग्रेड लाने वाले बच्चे को अगली क्लास में बैठे हुए देखता है तो पूछता है कि मैडम फिर हम क्यों मेहनत करते है ? अब क्या जवाब दे एक टीचर अपने उस बच्चे को कि वो मेहनत क्यों  करे।

मिडिया जो अध्यापकों के विरोध में आने वाली हर न्यूज़ को तो ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर बार बार दिखाती है वो तब कहाँ जाती है जब कोई बच्चा नक़ल न करने देने वाले टीचर को हथियार से मार देता है या काम न करने पर या  बार बार काम मांगने वाले टीचर को बालों से पकड़ कर दिवार पर दे मारता है। मिडिया टीवी पर ये तो बार बार कहती है कि बच्चों के कौन से अधिकार है लेकिन कभी ये भी तो बता दो उन बच्चों को कि  उनके कुछ फ़र्ज़ भी है।

आज तक याद हे जब पेरेंट्स आ कर कहते थे मैडम हमने बच्चा आपको सौंप दिया अब आप ही इसका सब कुछ है बड़ा फख्र होता था अपने टीचर होने पर आज कोई अगर ये कहे कि  मुझे अध्यापक बनना हे तो मन करता है की कह दू "बेटा ये फटे का ढोल है न बजाए बने न फेंकते" मुस्कुरा कर रह जाती हूँ।

एक जोक याद आ रहा है जब ईश्वर हरेक से पूछते है की तुम्हे स्वर्ग में क्यों आने दिया जाए और टीचर कहता है मै एक अध्यापक हूँ बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ अपने काम गिनवाना शुरू करता है लम्बी लिस्ट जो ख़त्म ही नही होती और ईश्वर कहतें है अंदर आ जा पागल अब रुलाएगा क्या। इतने सारे चार्जेज के साथ अपना सिलेबस टाइम पर खत्म  करना और आह तक न भरना यही तो गुण है आज के टीचर के।

चलो शायद कभी हमारे भी दिन बदले और हमारे भारत में भी विदेश की तरह अध्यापकों को सम्मान पूर्ण स्थान मिलेगा इसी उम्मीद के साथ एक अध्यापिका ........... ।      

Tuesday, 15 September 2015

देर आए दुरुस्त आए


जिंदगी मे हर उम्र पर अलग तरह की खुशियां अलग तरह की चिंताए और अलग ही जरूरतें होती है। आज जब आस पास स्कूल में सुनती हूँ की बच्चों की रिजल्ट आने वाले है माएं परेशान है कि क्या होगा ? क्या रिजल्ट आएगा कहाँ एड्मिशन होगा मै अपने बच्चों के रिजल्ट एवं एड्मिशन के दिनों में पहुँच जाती हूँ।  आज ये समझ आता है कि मैने अपने बच्चों को पढ़ाई एक हौवा जैसा बना कर रखा था। 

क्लास टेस्ट में पुरे नंबर क्यों नही आये ये दो नंबर कहाँ कट गए क्यों कट गए हमेशा इसी बात के लिए नाराज़ होती रही ,वो जो १८ नंबर आये कभी उसके लिए खुश नही हुई बच्चों का होसला नही बढ़ाया कि कोई नही अगली बार आ जायेंगे १८ नंबर भी तो बहुत बढ़िया है। जैसे जैसे बड़ी हो रही हूँ ये समझ आ रहा है की मेने न सिर्फ अपनी टेंशन पाल रखी थी बल्कि कहीं न कहीं बच्चों से उनका बचपन भी छीन ही लिया था।
ईश्वर की कृपा से दोनों बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे थे आई० आई०  टी ० के आगे से निकलती तो सोचती मेरा बेटा बड़ा हो कर इंजीनियर बनेगा तो यहीं पढ़ेगा एम्स के आगे से निकलती तो सोचती की बेटी को डॉक्टर बनाऊँगी  तो वो यहां पढ़ेगी। असल में मैं  अपने बच्चो से अपनी जिंदगी की अधूरी इच्छाएं पूरी होने की उम्मीद करती थी।

वो सब तब गलत नही लगता था की क्या बच्चे ही तो माँ बाप की ख्वाहिशें पूरी करते हैं मैं कुछ  गलत थोड़ी सोच रही हूँ। सबसे खराब क्सपीरिएंस तो तब था जब बेटे का आई ० आई ० टी ० का रिजल्ट आना था और मै खुद ३ दिन तक सो नही पायी मुझे यही डर सता रहा था की अगर उसका आई ० आई ० टी ० में  एडमिशन नही हुआ तो क्या होगा? घबराहट व् टेंशन मे समझ ही नही आ रहा था कि अपना दर्द किससे कहूँ ? ईश्वर से हर घड़ी बस यही प्रार्थना कर रही थी की भगवान  इस बार बचा लो आगे जिंदगी में  अपने साथ साथ किसी की जिंदगी हराम नही करुँगी। आखिर वो दिन आया जब रिजल्ट डिक्लेअर होना था।  फ़ोन की घंटी बजती मेरा कलेजा मुँह को आ जाता कि न जाने क्या होगा फ़ोन की घंटी बजी और इन्होने कहा कि  हमारा बेटा सेलेक्ट हो गया। ऐसा लगा कि मुझे सब कुछ मिल गया। इतना रोयी कि घर में सब हैरान कि इतनी ख़ुशी की बात और मै थी कि  रोये ही जा रही थी सब मुबारक बाद दे रहे थे और मै अपने मन में ये प्रण कर रही थी कि ईश्वर मुझे इतनी बुद्धि देना की जो हुआ सो हुआ आगे से मैं अपने बच्चों को इस तरह से टेंशन न दूँ।

बस वो दिन है और आज का दिन मेने बच्चों की छोटी छोटी उपलब्धियों पर भी खुश होना सीख लिया है बिटिया को जो तू चाहती है वो कर यह कह कर खुद भी रिलैक्स रही और किसी को भी टेंशन नही दी। अब तो स्कूल में पेरेंट्स को भी यही समझाती हूँ की हर बच्चे में अलग विशेषता होती हे हर बच्चा कुछ न कुछ जरूर बनता है। 

हाँ ये सच है की ये सब सीखने के लिए मेने बहुत बड़ा एग्जाम दिया। सच ही तो है देर आए दुरुस्त आए।   

Monday, 31 August 2015

शुक्रिया


आज स्कूल  से घर आकर टीवी चलाया तो ज़िंदगी चैनल पर शुक्रिया प्रोग्राम आ रहा था।  प्रोग्राम मे एक पोती अपने दादा और दादी का शुक्रिया करते हुए "फलेश-मॊब" एक्ट करती है। उसके अनुसार उसके दादा और दादी ने उसे जीवन में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी इसलिए वो उनका शुक्रिया कर रही है।

मुझे उसी पल यह एहसास हुआ कि मुझे भी अपनी जिंदगी में इस मुकाम पर लाने वाले मेरे पति का मैंने कभी शुक्रिया नहीं किया। मैं  आज  याद करती हूँ ३२ साल पहले १९ वर्ष की उम्र में जब पढ़ाई करते-करते ही मम्मी -डैडी ने विवाह करके रुखसत कर दिया था, उस वक्त मेरा हाथ थामा मेरे पति ने। नया घर, नए लोग, सब कुछ नया  - ना अपने घर जैसा माहौल, ना खानपान - सब कुछ बदला बदला सा था।

ऐसे समय में इन्होने अपने परिवार के नियम-रिवाज़ सबसे मेरा परिचय करवाया। कभी यह एहसास ही नही होने दिया कि मैं इस घर में नई हूँ। मेरे परिवार को अपना परिवार मान कर हर काम हर अवसर पर मदद की। इन्होने कभी मुझे किसी चीज़ के लिए नही रोका बल्कि आगे बढ़ कर मेरी मदद की।  मेरी पढाई पूरी करवाई  बी० एड ० करवाया तथा मेरे जैसी अंतर्मुखी , सकुचाई सी लड़की को टीचर्स रिक्रूटमेंट एग्जाम दिलवा कर जॉब में लगवाया एवं आत्मनिर्भर बनाया। किस मौके पर हमें  किस तरह से पेश आना है, किसी मुश्किल परिस्थिति पर कैसे रिएक्ट करना है सब मैंने अपने पति से सीखा।

मेरे व्यक्तित्व का जो भी पहलु आज सबके सामने है, सब इनकी ही देन है। आपके हर सपोर्ट के लिए आपका  बहुत बहुत शुक्रिया खन्ना साहिब।                                                                                  

Monday, 24 August 2015

जिंदगी के फंडे


जो  कुछ  भी  हमारे  पास  हो  वो  सदा  कम ही लगता  हैं।   नंगे  पाॅव चलने वाला चप्पल की आस करता है , चप्पल जिसके पास है वो साइकिल होती तो मजे हो जाते , साइकिल पा जाने पर मोपेड या मोटर साइकिल की आस करने लगता है।  मोटर साइकिल मिलने पर कार की तमन्ना जोर पकड़ने  लगती है अर्थात मनुष्य हमेशा जो कुछ भी उसके पास है वो कम है दूसरे के पास ज्यादा है से ही दुःखी रहते  हैं ।

जिंदगी में अगर कुछ गलत हो सकता है तो वो जरूर होगा  यानि कहीं ये न हो जाये हमारे मन में जो विचार आ जाता है वही अक्सर होता है। 

मौन  रह कर अक्सर बडी बहस जीती जा सकती है। 

वाणी में  बड़ी शक्ति होती है कड़वा बोलने वाला अपना शहद  नही बेचपाता और मीठा बोलने वाला मिर्ची भी बेच जाता  है। 

संघर्ष व चुनौतियां इंसान को प्रखर एवं मजबूत बनाती है उसकी प्रतिभा को निखारती  है। 

ईश्वर ने कोई मुश्किल ऐसी नही बनाई जिसका हल न बनाया हो बिलकुल ऐसे जैसे कोई ताला  नही बनता चाबी के बिना।  

मुस्करा कर सारा जहाँ जीता जा सकता है ये वो मेकअप है जो बिना पैसे खर्च किये आपकी फेसवेल्यु बड़ा देती है।  

ईश्वर उनकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करना चाहते है। 

अपनी जरूरतों के लिए आवाज़ उठानी पड़ती है बिना रोये तो माँ भी दूध नही देती।  

जिंदगी एक फलसफा है दोस्तों गर समझ आ गया तो जीत वरना हार का सिलसिला है दोस्तों।