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Tuesday, 1 March 2016

वो एक दिन...!

आज सुबह से ही तबियत कुछ ढीली सी लग रही थी। क्लास मे भी खड़े रह कर पढ़ाना और फिर एग्जाम का प्रेशर बच्चों को बार बार प्रैक्टिस टेस्ट देना, लग रहा था कि शरीर में अब और ताकत नही बची कि घर जाकर कुछ कर पाऊँगी। जैसे तैसे स्कूल में छुट्टी की घंटी बजी और मैं घर जाने की जल्दी में निकली।

    बाहर निकलते  ही रिक्शा मिला शुक्र मनाया नही तो कई बार तो रिक्शा के इंतजार में ही दस पंद्रह मिनट लग जाते हैं। रिक्शा पर बैठते ही घर की वस्तु स्थिति सामने घूमने लगी मेरे स्कूल चले जाने के बाद पतिदेव ने नहा कर तौलिया वहीं छोड़ दिया होगा। किचेन अंदर घुसते ही मुंह चिढ़ाती सी प्रतीत होती है जैसे वो भी इसी इंतजार मैं बैठी होकि अभी मैडम आएँगी तो मुझेभी साफ सफाई करके मेरी रौनक वापिस लायेंगी। और उधर मैले कपडे जिन्हे सुबह जल्दबाज़ी में छोड़ आई थी की दिन में आ कर देखूंगी आँखों के अँधेरा छा रहा था। चलो पहले घर तो पहुँच जाऊँ फिर देखी जाएगी क्या करूंगी। "मैडम किधर जाना है"आवाज़ से तन्द्रा भंग हुई। "सीधे हाथ मोड़ कर रोक देना भैया, धन्यवाद"।

    पर्स में से चाबी निकलने लगी तो याद आया आज तो बेटा घर पर है कल ही तो आया है बनारस से, वो हॉस्टल में रहता है कभी कभार लॉन्ग वीकेंड हो तो आ जाता है। घंटी बजते ही बेटे ने दरवाजा खोला उसका मुस्कुराता चेहरा देख कर आधी थकान तो वैसे ही उतर गयी। "उठ गया बेटा?  कुछ खाया तूने? मैं जल्दी से कुछ बना देती हूँ अभी", पर्स रखते हुए बोली। मेरी आँखों को खुद पर यकीं नही आ रहा हो जैसे ऐसे खुली की खुली रह गयी। कमरा एकदम साफ, बिस्तर करीने से लगा हुआ, शीट्स तह कर के रखी हुई। "ये क्या आज तूने बिस्तर सम्हाले?" "हाँ जी, क्यों?" बेटे ने बड़ी हैरानी से पूछा। मैं हैरान सी आँखों से उसे देख रही थी बाहर देखा तो कपडे सूख रहे थे अब तो मुझे लगा  सपना देख रही हूँ।

        मुझे यकीं नही हो रहा था क्योंकि मेने तो बेटे को कभी काम करते नही देखा था और हमारे घर के रिवाजों के हिसाब से लड़के काम नही करते। कभी आधी रात में पानी भी चाहिए हो आवाज़ लगा कर मांगने वाला बच्चा आज माँ के सारे काम कर दे, ये तो बिलकुल ही अप्रत्याशित सा था। मैं कुछ कहती इससे पहले वही बोला "मम्मी, आप इतनी हैरान क्यों हो रही हो? अब मैने हॉस्टल में जाने के बाद इस चीज़ को समझा कि आप हमारे सारे काम कितनी सहजता से कर लेती। आप तो कभी ये भी नही कहते कि मैं थकी हूँ मैं नही करुँगी। पर मै जब क्लास से वापिस रूम पर आता था तो फैला बिस्तर, कपडे सब सम्हालने की हिम्मत भी नही होती थी। फिर मेने फैसला किया की सुबह ही सब ठीक कर लिया करूँगा।"

      " मुझे आपकी बहुत याद आती थी। साथ ही मन में ये बात भी कि मम्मी ने क्यों नही हमसे कभी काम करने को कहा अकेली ही सब कुछ करती रहीं। आपने मुझे पापा को क्यों नही कहा कि आप भी थक जाते हो हमें भी आपका हाथ बंटाना चाहिये। अब वक़्त बदल चुका है माँ जब आप हमारे लिए बाहर जाकर काम कर सकते हो तो हमे भी तो घर के कामों में आपकी हेल्प करनी चाहिए। अबसे हम सब मिल कर घर के और बाहर के सब काम करेंगे घर के काम सिर्फ आपकी जिम्मेदारी नही है माँ।"

    और मैं, मैं तो जैसे आकाश में  उड़ रही थी। जिंदगी भर तो यही सुनती रही जितना मर्जी पढ़ ले घर के काम तो तुझे करने ही पड़ेंगे मर्द थोड़ी घर का काम करते अच्छे लगते हैं। और आज मेरा बेटा मुझे ये एहसास करवा रहा है कि जब वर्क प्लेस पर हम सब एक समान हैं तो घर में क्यों नही। आसमान की तरफ देखते हुए बुदबुदा रही थी ईश्वर तेरे भी खेल न्यारे हैं कब क्या कर दे कुछ पता नही। 

I am joining the Ariel #ShareTheLoad campaign at BlogAdda and blogging about the prejudice related to household chores being passed on to the next generation.


Tuesday, 15 September 2015

देर आए दुरुस्त आए


जिंदगी मे हर उम्र पर अलग तरह की खुशियां अलग तरह की चिंताए और अलग ही जरूरतें होती है। आज जब आस पास स्कूल में सुनती हूँ की बच्चों की रिजल्ट आने वाले है माएं परेशान है कि क्या होगा ? क्या रिजल्ट आएगा कहाँ एड्मिशन होगा मै अपने बच्चों के रिजल्ट एवं एड्मिशन के दिनों में पहुँच जाती हूँ।  आज ये समझ आता है कि मैने अपने बच्चों को पढ़ाई एक हौवा जैसा बना कर रखा था। 

क्लास टेस्ट में पुरे नंबर क्यों नही आये ये दो नंबर कहाँ कट गए क्यों कट गए हमेशा इसी बात के लिए नाराज़ होती रही ,वो जो १८ नंबर आये कभी उसके लिए खुश नही हुई बच्चों का होसला नही बढ़ाया कि कोई नही अगली बार आ जायेंगे १८ नंबर भी तो बहुत बढ़िया है। जैसे जैसे बड़ी हो रही हूँ ये समझ आ रहा है की मेने न सिर्फ अपनी टेंशन पाल रखी थी बल्कि कहीं न कहीं बच्चों से उनका बचपन भी छीन ही लिया था।
ईश्वर की कृपा से दोनों बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे थे आई० आई०  टी ० के आगे से निकलती तो सोचती मेरा बेटा बड़ा हो कर इंजीनियर बनेगा तो यहीं पढ़ेगा एम्स के आगे से निकलती तो सोचती की बेटी को डॉक्टर बनाऊँगी  तो वो यहां पढ़ेगी। असल में मैं  अपने बच्चो से अपनी जिंदगी की अधूरी इच्छाएं पूरी होने की उम्मीद करती थी।

वो सब तब गलत नही लगता था की क्या बच्चे ही तो माँ बाप की ख्वाहिशें पूरी करते हैं मैं कुछ  गलत थोड़ी सोच रही हूँ। सबसे खराब क्सपीरिएंस तो तब था जब बेटे का आई ० आई ० टी ० का रिजल्ट आना था और मै खुद ३ दिन तक सो नही पायी मुझे यही डर सता रहा था की अगर उसका आई ० आई ० टी ० में  एडमिशन नही हुआ तो क्या होगा? घबराहट व् टेंशन मे समझ ही नही आ रहा था कि अपना दर्द किससे कहूँ ? ईश्वर से हर घड़ी बस यही प्रार्थना कर रही थी की भगवान  इस बार बचा लो आगे जिंदगी में  अपने साथ साथ किसी की जिंदगी हराम नही करुँगी। आखिर वो दिन आया जब रिजल्ट डिक्लेअर होना था।  फ़ोन की घंटी बजती मेरा कलेजा मुँह को आ जाता कि न जाने क्या होगा फ़ोन की घंटी बजी और इन्होने कहा कि  हमारा बेटा सेलेक्ट हो गया। ऐसा लगा कि मुझे सब कुछ मिल गया। इतना रोयी कि घर में सब हैरान कि इतनी ख़ुशी की बात और मै थी कि  रोये ही जा रही थी सब मुबारक बाद दे रहे थे और मै अपने मन में ये प्रण कर रही थी कि ईश्वर मुझे इतनी बुद्धि देना की जो हुआ सो हुआ आगे से मैं अपने बच्चों को इस तरह से टेंशन न दूँ।

बस वो दिन है और आज का दिन मेने बच्चों की छोटी छोटी उपलब्धियों पर भी खुश होना सीख लिया है बिटिया को जो तू चाहती है वो कर यह कह कर खुद भी रिलैक्स रही और किसी को भी टेंशन नही दी। अब तो स्कूल में पेरेंट्स को भी यही समझाती हूँ की हर बच्चे में अलग विशेषता होती हे हर बच्चा कुछ न कुछ जरूर बनता है। 

हाँ ये सच है की ये सब सीखने के लिए मेने बहुत बड़ा एग्जाम दिया। सच ही तो है देर आए दुरुस्त आए।