Tuesday, 8 March 2016

HAPPY WOMEN'S DAY

आज सुबह नींद खुलते ही कैलेंडर पर नज़र पड़ी ८ मार्च आज तो "इंटरनैशनल वीमेन'स डे" है। फ़ोन उठाया तो हर ग्रुप पर हैप्पी वीमेन'स डे के बड़े अच्छे मेसेजस थे। कहीं चेस की क्वीन, कहीं घर की धुरी, कहीं कुछ कहीं कुछ और मैं ये सोच रही थी कि क्या सिर्फ एक ही दिन सबको याद आता है कि महिलाये घर गृहस्थी को चलाती हैं? सारा साल क्या हम कुछ नही करते? लेकिन फिर यही सोचने लगी कि चलो एक दिन तो भाव मिल रहा हैं, एन्जॉय कर लो।
आज मुझे कुछ मैसेज बहुत अच्छे लगे जिन्हे मै यहां शेयर करना चाहती हूँ नही जानती किसने रचा इनको बस मन को भा गये।

    मैं क्या हूँ, ये सोचती खुद में डूबी हुई हूँ
    मैं हूँ क्या????
    कोई डूबते सूरज की किरण
    या आईने में बेबस सी कोई चुप्पी
    या माँ की आँखों का कोई आँसू
   या बाप के माथे की चिंता की लकीर
    बस इस दुनिया के समुन्दर में
   कांपती हुई सी कोई कश्ती
    जो हादसों की धरती पर
   खुद की पहचान बनाते बनाते
   एक दिन यूँ ही खत्म हो जाती है
   चाहें हो पंख मेरे उड़ने के कितने
   फिर भी क्यों
   कई जगह खुद को बेबस पाती हूँ ?
   शायद ये कवियत्री भी मेरी तरह एक दिन के सम्मान पर हैरान है।
   तन चंचला
    मन निर्मला
    व्यवहार कुशल
    भाषा कोमला
    सदैव समर्पिता।

    नदिया सा चलना
     सागर से मिलना
    खुद को भुला कर भी
    अपना अस्तित्व सम्हालना
     रोशन अस्मिता।
     सृष्टि की जननी
     प्रेम रूप धरिणी
     शक्ति सहारिणी
    सबल कार्यकारिणी
    अन्नपूर्णा अर्पिता।

    मूरत ममता
    प्रचंड क्षमता
    प्रमारित विधायक
   सौजन्य विनायक
   अखंड सहनशीलता।

   आज का युग तेरा है परिणता
   नारी तुझ पर संसार गर्विता।

ऐसे बहुत से विचार आज पढ़ने को मिले जो दिल को छू गए। सभी रचियताओं की अद्वितीय रचनाऍ हैं जिनसे कभी अपनी बेबसी और कभी अपने महिला होने पर गर्व महसूस हुआ। ऐसे रचनाकारों को मेरा नमन।   

Wednesday, 2 March 2016

सुजाता की कहानी

आज 'नो एग्जामिनेशन डे' था - बच्चे तो थे नहीं, सो हम सब स्टाफ रूम में बैठे इधर उधर की गप्पें मार रहे थे। बातें बजट से शुरू हुई कि बजट मे क्या अच्छा लगा और क्या पसंद नही आया। फिर टीवी, बॉलीवुड से होती हुई और परिवार पर जा पहुँची। "मैडम आप इतनी सुबह क्यों उठ जाते हो" इधर से एक ने पूछा, जब तक वो जवाब देतीं तब तक दूसरी मैडम बोल उठी "बेचारी सारा काम खुद जो करती हैं।" "मतलब?", हैरानी से पूछा सुजाता ने जो अभी अभी स्टाफ रूम में दाखिल हुई थी। "अरे इनकी किस्मत तुम्हारे जैसी थोड़ी है जो घर के कामों में कोई हाथ बंटा दे ,घर के सारे काम ये खुद करती हैं।" "वो तो सभी करते हैं, इसमें क्या बड़ी बात है?" इन सारी बातों के बीच सुजाता ने कहा कि "आपको क्या लगता है कि मेरे लिए ये सब इतना आसान रहा होगा कि पुराने विचारों वाले परिवार में अपनी जगह बनाना और पति से काम में मदद करवा लेना वो भी संयुक्त परिवार में, फिर ??"

सुजाता ने जो आप बीती सुनाई वो मैं आप सबको उसी की जुबानी सुना रही हूँ।

        "जब  मेरी सगाई इनसे हुई तो मै बहुत खुश थी। सुन्दर, स्मार्ट, अच्छी नौकरी, अच्छी तनख्वाह, छोटा सा परिवार, पढ़े लिखे सास ससुर और क्या चाहिए किसी को भी। बस मेरे सपने हकीकत में बदल रहे थे। शुरू शुरू में तो सब कुछ बहुत बढ़िया था, लेकिन उस दिन मेरे पैरों के नीचे से जमीं ही खिसकगयी जब सासु माँ ने कहा कि "बेटा थोड़ा घर का भी ध्यान देना शुरू करो। तुम्हारी छुट्टियाँ भी ख़त्म होने को हैं, हम भी कब तक तुम्हारा ध्यान रख सकते हैं। अपना काम खुद करना शुरू करो।" "हाँ जी" कह कर मै अपने कमरे में आ गयी।

         जब मेरे स्कूल शुरू हुये तो मेरी मुश्किलें शुरू हो गयी। सुबह कपडे धो कर फैलाने का टाइम नहीं, खाना बन गया तो पैक नही कर पायी। कभी हस्बैंड से कहा की प्लीज हेल्प कर दिया करो तो उनका कहना कि "मम्मी पापा क्या कहेंगे कि बीवी की मदद कर रहा हूँ।" "तो?" वो बिना कोई जवाब दिए निकल जाते। मै उसी तरह अनाड़ी की तरह एक काम सही करती तो दूसरा बिगाड़ देती। सब कुछ बदल रहा था, घर का माहौल भी रिश्ते भी। मैं कुछ नही कर पा रही थी। एकाध बार माँ से जिक्र किया तो माँ ने भी यही जवाब दिया कि घर का काम तो औरत को ही करना होता है।

      सब के बीच मै कहीं टूट रही थी घर मुझसे सम्हाल नही रहा था। स्कूल का काम टाइम से पूरा नही हो रहा था और मै डिप्रेशंन में आती जा रही थी। डॉ. से मिलकर प्रॉब्लम डिसकस की तो डॉ ने इनसे पूछा क्या घर में सब ठीक है? "हम्म ठीक ही है, बस मैडम ही अपसेट हैं।" "सुजाता मुझे बताओ कि तुम्हें क्या परेशानी है?" "कुछ नही। जब मैं सब ठीक करने की कोशिश करती हूँ तो बाकी सब गड़बड़ हो जाता है। मै कुछ भी सही नही कर पाती।"

   डॉ. ने मेरे पति से कहा की जब ये काम करने में घबरा जाती है तो आप क्या मदद नही करते? "घर के काम तो इसी को करने हैं, मैं तो पुरुष हूँ। मेरा काम पैसा कमाना है, न कि कपडे सुखाना या लंच पैक करना।" "क्यों? ये सब सिर्फ इसी का काम क्यों है? चलो मान लिया फिर नौकरी करना इसका काम क्यों है? ये दो जगह काम करे और दोनों जगह पूरे समर्पण के साथ और आप, आप की तो शान कम हो जाएगी ज़रा सी मदद कर देंगे, तो ठीक है। सुजाता आप भी छोड़ दो नौकरी इन्हे आपके पैसे की कोई मदद नही चाहिए। ठीक कह रही हूँ न मैं? आप एक दिन इसे खो देंगे वर्ना अपनी झूटी ईगो से बाहर आ जाइये। इलाज की जरूरत इसे नही आपको व आपके परिवार को है।" 

ना जाने उस डॉ. की बातों का असर था या सच में मुझे खो देने का डर, अगली सुबह चाय प्याली ले कर मेरे पति मुझे जगाते हुए बोले, "उठो स्कूल को देर हो जाएगी" और मैं डर कर बाहर देखने लगी की मम्मी देख लेंगी तो क्या कहेंगी? और ये हँस कर बोले कि मेने मम्मी को तुम्हारी प्रॉब्लम बताई तो मम्मी ने खुद मुझे कहा हे कि अगर मुझे तुमसे नौकरी करवानी है तो तुम्हारी मदद करूँ। और बस उस दिन से हम सब मिल कर घर में काम करते हैं।

   और मैं ,मैं ये सोच रही थी ईश्वर का लाख लाख धन्यवाद कि उसने सुजाता के परिवार के लोगों को मिलकर घर चलाने की बुद्धि प्रदान की नही तो मैं इतनी प्यारी सहेली से कभी न मिल पाती।


I am joining the Ariel #ShareTheLoad campaign at BlogAdda and blogging about the prejudice related to household chores being passed on to the next generation.

जब तक पूरे न हो फेरे सात...!

"न जब तक पूरे न हो फेरे सात" रेडियो पर ये गाना चल रहा था। "सात फेरे धरो बबुआ भरो सात वचन भी" यह सुनते ही हंसी आ गयी कि ३५ साल पहले जब हमारी शादी हुई थी तब भी तो पंडितजी ने  वचन भरवाये थे। तब तो श्रीमान जी बड़े आज्ञाकारी की तरह पंडितजी के पीछे पीछे वचन दोहरा रहे थे, उसके बाद कभी कोई वचन याद भी होगा ऐसी उम्मीद मुझे नही रही। बिना कोई वादा किये हम दोनों अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारियाँ पूरी कर रहे है। ईश्वर की कृपा से न कभी मुझे उन वचनों को याद करवाने जरूरत हुई न किसी उलाहने की, कि आपने ये वादा पूरा नही किया। अपने भरे पूरे परिवार के साथ मै बहुत खुश हूँ। पर जब अपनी सहेलियों की बातें सुनती  हूँ कि उसके पति ने उससे ये वादा किया तो सोचती हूँ कि अगर कभी मुझे अपने पति से कुछ कसम भरवानी हो तो वो क्या होंगी ?? शायद इनमे से कुछ :-

   जब भी ये अपने भाई बहिनो के साथ होते है तो कभी मेरे मोटापे को लेकर कभी मेरे सफ़ेद बालों को लेकर मजाक करते है। ये तो मानने वाली बात है हमारे परिवार में मुझे छोड़ कर कोई मोटा नही है पर सबके सामने इनकी सेहत का राज यही तो है कहना मुझे कॉन्शियस कर जाता है तो सबसे पहली कसम तो इन्हें यही दिलवानी है की मेरी सेहत मजाक कभी नही उड़ाएंगे।

    गीला तोलिया नहाने के बाद बेड पर छोड़ देना कभी गलत ही नही लगा साहेब को चाहें हम कितना ही कुनमुनाते रहें। नहा कर टॉवल बाहर ही फैलाएंगे ये वादा करना होगा साहेब जी।

  मोबाइल मेरे हाथ में देखते ही गुस्से से लाल पीले हो जाते हैं। कभी कभी ये जोक सच लगता है सारा दिन सब काम करो पर जैसे ही फ़ोन हाथ में लो सब ऐसे देखते है कोई गुनाह कर रहे हैं। तीसरी कसम चाहिए कि मैं जब चाहूँ जितनी देर चाहूँ फ़ोन पर गेम खेलूं चैट करूँ ये मुझे डिस्टर्ब नही करेंगे :)

    और हाँ जब भी मेरी फ्रेंड्स घर आती हैं आप मुझे किचेन में कुछ अच्छा सा बनाओ ये कौन सा रोज़ तुम्हारे आती हैं कह कर भेज देते हैं और उनके साथ गप्प मारने में बिजी हो जाते हैं। मै किचन में चाय नाश्ता तैयार करती हूँ और ये मजे से दुनिया भर की बातें बनाते हैं। ऐसा लगता है की वो मुझसे नही इनसे मिलने आई है। इनसे ये वादा कि जब फ्रेंड्स आएं ये गप्पे मारने के बजाय उनके आवभगत की जिम्मेदारी खुद लें।और मै अपनी फ्रेंड्स के साथ  एन्जॉय करूँ :)

   बस और कुछ नही करवाना मुझे :) एक्चुअली मेरे वो मिस्टर परफेक्ट हैं। जैसे भी है मेरे पति मेरे देवता हैं।

Tuesday, 1 March 2016

वो एक दिन...!

आज सुबह से ही तबियत कुछ ढीली सी लग रही थी। क्लास मे भी खड़े रह कर पढ़ाना और फिर एग्जाम का प्रेशर बच्चों को बार बार प्रैक्टिस टेस्ट देना, लग रहा था कि शरीर में अब और ताकत नही बची कि घर जाकर कुछ कर पाऊँगी। जैसे तैसे स्कूल में छुट्टी की घंटी बजी और मैं घर जाने की जल्दी में निकली।

    बाहर निकलते  ही रिक्शा मिला शुक्र मनाया नही तो कई बार तो रिक्शा के इंतजार में ही दस पंद्रह मिनट लग जाते हैं। रिक्शा पर बैठते ही घर की वस्तु स्थिति सामने घूमने लगी मेरे स्कूल चले जाने के बाद पतिदेव ने नहा कर तौलिया वहीं छोड़ दिया होगा। किचेन अंदर घुसते ही मुंह चिढ़ाती सी प्रतीत होती है जैसे वो भी इसी इंतजार मैं बैठी होकि अभी मैडम आएँगी तो मुझेभी साफ सफाई करके मेरी रौनक वापिस लायेंगी। और उधर मैले कपडे जिन्हे सुबह जल्दबाज़ी में छोड़ आई थी की दिन में आ कर देखूंगी आँखों के अँधेरा छा रहा था। चलो पहले घर तो पहुँच जाऊँ फिर देखी जाएगी क्या करूंगी। "मैडम किधर जाना है"आवाज़ से तन्द्रा भंग हुई। "सीधे हाथ मोड़ कर रोक देना भैया, धन्यवाद"।

    पर्स में से चाबी निकलने लगी तो याद आया आज तो बेटा घर पर है कल ही तो आया है बनारस से, वो हॉस्टल में रहता है कभी कभार लॉन्ग वीकेंड हो तो आ जाता है। घंटी बजते ही बेटे ने दरवाजा खोला उसका मुस्कुराता चेहरा देख कर आधी थकान तो वैसे ही उतर गयी। "उठ गया बेटा?  कुछ खाया तूने? मैं जल्दी से कुछ बना देती हूँ अभी", पर्स रखते हुए बोली। मेरी आँखों को खुद पर यकीं नही आ रहा हो जैसे ऐसे खुली की खुली रह गयी। कमरा एकदम साफ, बिस्तर करीने से लगा हुआ, शीट्स तह कर के रखी हुई। "ये क्या आज तूने बिस्तर सम्हाले?" "हाँ जी, क्यों?" बेटे ने बड़ी हैरानी से पूछा। मैं हैरान सी आँखों से उसे देख रही थी बाहर देखा तो कपडे सूख रहे थे अब तो मुझे लगा  सपना देख रही हूँ।

        मुझे यकीं नही हो रहा था क्योंकि मेने तो बेटे को कभी काम करते नही देखा था और हमारे घर के रिवाजों के हिसाब से लड़के काम नही करते। कभी आधी रात में पानी भी चाहिए हो आवाज़ लगा कर मांगने वाला बच्चा आज माँ के सारे काम कर दे, ये तो बिलकुल ही अप्रत्याशित सा था। मैं कुछ कहती इससे पहले वही बोला "मम्मी, आप इतनी हैरान क्यों हो रही हो? अब मैने हॉस्टल में जाने के बाद इस चीज़ को समझा कि आप हमारे सारे काम कितनी सहजता से कर लेती। आप तो कभी ये भी नही कहते कि मैं थकी हूँ मैं नही करुँगी। पर मै जब क्लास से वापिस रूम पर आता था तो फैला बिस्तर, कपडे सब सम्हालने की हिम्मत भी नही होती थी। फिर मेने फैसला किया की सुबह ही सब ठीक कर लिया करूँगा।"

      " मुझे आपकी बहुत याद आती थी। साथ ही मन में ये बात भी कि मम्मी ने क्यों नही हमसे कभी काम करने को कहा अकेली ही सब कुछ करती रहीं। आपने मुझे पापा को क्यों नही कहा कि आप भी थक जाते हो हमें भी आपका हाथ बंटाना चाहिये। अब वक़्त बदल चुका है माँ जब आप हमारे लिए बाहर जाकर काम कर सकते हो तो हमे भी तो घर के कामों में आपकी हेल्प करनी चाहिए। अबसे हम सब मिल कर घर के और बाहर के सब काम करेंगे घर के काम सिर्फ आपकी जिम्मेदारी नही है माँ।"

    और मैं, मैं तो जैसे आकाश में  उड़ रही थी। जिंदगी भर तो यही सुनती रही जितना मर्जी पढ़ ले घर के काम तो तुझे करने ही पड़ेंगे मर्द थोड़ी घर का काम करते अच्छे लगते हैं। और आज मेरा बेटा मुझे ये एहसास करवा रहा है कि जब वर्क प्लेस पर हम सब एक समान हैं तो घर में क्यों नही। आसमान की तरफ देखते हुए बुदबुदा रही थी ईश्वर तेरे भी खेल न्यारे हैं कब क्या कर दे कुछ पता नही। 

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Monday, 23 November 2015

बच्चों की कोमल त्वचा के लिए कुछ नुस्ख़े!

घर मे नए मेहमान के आने की खबर मन को गुदगुदा जाती है। कल्पना मेँ बेबी के नाजुक से पैर, गुलाबी सी त्वचा, छोटी छोटी उँगलियाँ सब घूम जाता है तभी एक डर भी मन मे घर कर जाता है कि मैं अपने बच्चे की देखभाल कर भी पाऊँगी या नहीं। लेकिन जब मैं किसी को इस तरह की परेशानी मे देखती हूँ तो अपनी जिंदगी के कुछ अनुभव उनके साथ जरूर शेयर करती हूँ।

नन्हे बच्चे की मासूम गुलाबी स्किन की देखभाल सबसे ज्यादा जरूरी होती है तो सबसे पहले हमे उसके सोप, क्रीम, शैम्पू आदि पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। ये सब चीज़ें केमिकल्स रहित हो तथा इनसे बच्चे को किसी भी तरह से एलर्जी न हो इस बात का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। जिससे की यदि गलती से झाग बच्चे की आँख मे चली भी जाये तो बच्चो को जलन न हो।

बच्चे को नहलाने के लिए हमेशा गुनगुना पानी ही प्रयोग में लाना चाहिए। बच्चे को पानी के संपर्क में लाने से पहले ये भली प्रकार चैक कर ले कि पानी ना तो ज्यादा ठंडा हो ना ही ज्यादा गर्म। ज्यादा ठन्डे पानी से बच्चे को ठण्ड लगने का डर रहता है तथा ज्यादा गर्म पानी से जलने का खतरा भी हो सकता है तथा गर्म पानी से स्किन की नमी भी कम हो सकती है। 

बच्चो को नहलाने के बाद सदेव मुलायम तोलिये से पोंछना चाहिए क्योंकि बच्चों की स्किन बहुत नाज़ुक होती है। कड़े तोलिये का प्रयोग उनकी स्किन को नुकसान पहुंचा सकता है इसके लिए पहले थोड़ा प्रयोग किया हुआ टॉवल भी सॉफ्ट रहता है।

बच्चों को नहलाने के बाद बेबी लोशन या मॉइश्चराइसिंग क्रीम का प्रयोग करना चाहिए ताकि सर्दियों में बच्चा ड्राइनेस से बच सके तथा कम्फ़र्टेबल फील कर सके। यदि बच्चे को कोई क्रीम या लोशन सूट न करे तो बेबी आयल से भी मालिश की जा सकती है। उस समय थोड़ा सा बेबी पाउडर भी सॉफ्ट पार्ट्स पर जरूर डाल देना चाहिए।

बच्चों को सबसे ज्यादा इर्रिटेशन गीले रहने पर होती है। पुराने समय में जब डाइपर्स नहीं होते थे तब जेंट्स के पुराने कुर्ते में से बच्चों की नैप्पी बनाई जाती थी। लेकिन तब भी बच्चे थोड़े समय में ही उसे गीला कर देते थे और बार बार बदलना पड़ता था जिससे बच्चे साउंड स्लीप नही ले पाते थे इस वजह से बच्चे और माँ दोनों परेशान रहते थे। लेकिन अब पंपेर्स प्रीमियम केयर पैंटीज तथा अन्य कई कम्पनीज की डाइपर्स मार्किट में उपलब्ध है जिससे बच्चे सूखा फील करते हैं तथा आराम से पूरी नींद ले पाते है। ज्यादा देर के लिए बाहर जाने पर भी डाइपर्स का प्रयोग एक अच्छा ऑप्शन है इससे सभी कम्फर्टेबल फील करते है। एक बात यहाँ भी ध्यान देने वाली है की बच्चोँ के डाइपर्स टाइम टू टाइम बदलते रहना चाहिए ताकि बच्चों को नैप्पी रेशेस न हो जाये और वो हँसते मुस्कुराते रहें।



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एक पत्र बहू के नाम!

जब से बेटे की शादी हुई हर कोई जब भी मिलता यही पूछता और दादी कब बन रही हो मेरा जवाब यही होता कि  जब ईश्वर की मर्जी होगी तभी। और वो दिन आ ही गया जब मेरी बहु रानी ने मुझे फ़ोन करके ये खुशखबरी दी कि माँ आपकी दिली इच्छा ईश्वर ने पूरी कर दी हमारी बगिया में नया फ़ूल जुड़ने जा रहा है। मैंने भरे गले से बच्चों को बधाई दी ईश्वर का शुक्रिया किया व सबकी सुखी स्वस्थ व समृद्ध  जीवन की प्रार्थना की।


अब तो हर समय दिल में ख़ुशी के लड्डू फूट रहे थे लेकिन एक परेशानी भी मन में थी कि वर्किंग होते हुए मेरी बहु बच्चे को कैसे संभाल पायेगी उसकी ठीक से देखभाल कर भी पायेगी? लेकिन मन के किसी कोने से सदा यही आवाज़ आई की वो बहुत समझदार है मुझसे भी अच्छी तरह देखेगी वो, पर आप तो जानते हो सास तो सास है ऐसे कैसे अपनी बहु को कोई सीख न दे वो  तो सास कैसी हुई? बैठ गयी पेन और पेपर लेकर की बच्चों की त्वचा की देखभाल कैसे करे ये बताने।



प्रिय बिटिया

             सदा खुश रहो फलते फूलते रहो। बेटा मुझे तुम्हारी और बच्चे की बहुत फ़िक्र होती है। काश मै तुम्हारे साथ होती। पर क्योकि इस समय ये पॉसिबल नही लग रहा है सो सोचा कि तुम्हें कुछ खास बातें बता दूँ जिससे तुम्हे बच्चे की  देखभाल में दिक्कत न हो।


सबसे पहले ये बताना चाहती हूँ कि जब तुम्हारे पतिदेव का जन्म हुआ था तब डॉ ने दादी को शहद चटाने को मना किया पर उन्हें लग रहा था कि ये तो हमारे रिवाज़ है तुम्हारी बुआ ने तब समझाया था कि हमे बच्चे की हेल्थ सबसे पहले है। बच्चों को माँ का पहला दूध पिलाना बहुत जरूरी है। बच्चे को माँ का दूध अमृत है। ये बच्चों का इम्यून सिस्टम को इम्प्रूव करता है।



बेटा बच्चों की त्वचा बहुत कोमल होती है.उनकी स्किन को गीले होने से बचाना बहुत जरूरी है। उन्हें सूती कपड़े से या सॉफ्ट तौलिये से ही सदा पोंछना चाहिए।



बच्चों को बेबी सोप से ही नहलाना चाहिए। पर कभी कभी बच्चों की त्वचा बेबी सोप से भी एलर्जिक होती है उस हालात कोई दूसरा सॉफ्ट सोप यूज़ करना चाहिए।



बच्चों की मालिश बेबी आयल से जरूर करनी चाहिए इससे उनकी स्किन शाइन करती हे तथा सॉफ्ट होती है बच्चे भी मालिश करवाने में बहुत एन्जॉय करते है।



बच्चे बार बार नैप्पी गीली कर देते है सबसे ज्यादा बच्चे नैप्पी गीली होने पर रोते है। आजकल तो डायपर आते है जो बच्चों को काफी समय तक गीलेपन का एहसास नही होने देते व् उनकी त्वचा को भी सूखा रखते है कहीं बाहर जाते समय या रात को बच्चे को आराम की नींद लेने के लिए डायपर पहनाया जाये आजकल पंपेर्स प्रीमियम केयर पैंट्स काफी मददगार साबित हो रहे है।मेरी सहेली ने मुझे पंपेर्स प्रीमियम केयर पैंट्स के बारे में बताया है की ये काफी देर तक बच्चों को सूखा रखते हैं।



मैं ये जानती हूँ कि मेरी बेटी बहुत समझदार है और वो मुझसे ज्यादा बच्चे की केयर रखेगी। ईश्वर तुम्हे सदा खुश रखे व अच्छी सेहत बख्शे ताकि तुम अपनी व अपने परिवार की भली प्रकार देखभाल कर सको।


ढेरो प्यार के साथ तुम्हारी माँ!


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Wednesday, 21 October 2015

अध्यापिका की ज़ुबानी...!

"माँ जन्म देती है गुरु जीवन देता है", टीचर्स डे पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने स्टूडेंट्स के साथ बातचीत में  जब ये वाक्य कहा तो लगा कि शायद गुरु शिष्य की परम्परा को फिर से जीवन मिलने वाला है। अगर हमारे देश के प्रधान मंत्री टीचर्स की रिस्पेक्ट करने की बात कर रहे हैं तो जरूर मआशरे में भी यही सन्देश जायेगा और हम जो टीचर्स अपनी खोयी हुई इज़्ज़त के साथ भी अपनी ड्यूटी को पूरी शिद्दत के साथ निभाते जा रहे हैं, थोड़ी बहुत कद्र हमारी भी समाज में हो जाएगी।

ऐसा नही है कि आज हर कोई टीचर कम्युनिटी के अगेंस्ट है आज भी बहुत से बच्चे अपने टीचर को इज़्ज़त देते है गुरु की कही हर बात उनके लिए मायने रखती है। पर ज्यादा संख्या अब उनकी होती जा रही हे जो ये समझते है कि पहले सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती थी अब नही होती या अब  टीचर्स को सैलरी तो ज्यादा मिलती है काम नही करते।   जबकि तब भी टीचर अपनी जॉब को ईशवंदना की तरह ईमानदारी से करता था आज भी वह उसी ईमानदारी के साथ अपने काम को पूजा की तरह से कर रहे है। 

पता नही क्यों सरकार खराब रिजल्ट आने पर टीचर्स पर सारा बलेम डाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। वही टीचर जो सारी जिंदगी बच्चों को शिक्षा देता रहा आज से कुछ ही साल पहले की बात है जब सरकारी स्कूल के पढ़े  बच्चे अच्छे कॉलेज में एड्मिशन लेते थे डॉक्टर्स ,इंजीनियर्स और बड़ी बड़ी पोस्ट होल्डर्स होते थे फिर आज अचानक वही टीचर निष्कर्मण्य कैसे हो गया क्या वो पढ़ाना भूल गया या पढाई इतनी मुश्किल हो गयी की अब वो पढ़ा नही पा रहा आखिर ऐसा हो क्या गया।

आज जो पॉलिसीज लागू की गयी है वो बच्चों में पढाई को महत्व न देते हुए ये सोचने लगे है कि जब फेल तो हो नही सकते तो क्यों मेहनत करनी वो बच्चे जो कल तक फर्स्ट आने के लिए या १०० में से १०० नंबर पाने के लिए मेहनत करते थे वो अपने साथ E1 ग्रेड लाने वाले बच्चे को अगली क्लास में बैठे हुए देखता है तो पूछता है कि मैडम फिर हम क्यों मेहनत करते है ? अब क्या जवाब दे एक टीचर अपने उस बच्चे को कि वो मेहनत क्यों  करे।

मिडिया जो अध्यापकों के विरोध में आने वाली हर न्यूज़ को तो ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर बार बार दिखाती है वो तब कहाँ जाती है जब कोई बच्चा नक़ल न करने देने वाले टीचर को हथियार से मार देता है या काम न करने पर या  बार बार काम मांगने वाले टीचर को बालों से पकड़ कर दिवार पर दे मारता है। मिडिया टीवी पर ये तो बार बार कहती है कि बच्चों के कौन से अधिकार है लेकिन कभी ये भी तो बता दो उन बच्चों को कि  उनके कुछ फ़र्ज़ भी है।

आज तक याद हे जब पेरेंट्स आ कर कहते थे मैडम हमने बच्चा आपको सौंप दिया अब आप ही इसका सब कुछ है बड़ा फख्र होता था अपने टीचर होने पर आज कोई अगर ये कहे कि  मुझे अध्यापक बनना हे तो मन करता है की कह दू "बेटा ये फटे का ढोल है न बजाए बने न फेंकते" मुस्कुरा कर रह जाती हूँ।

एक जोक याद आ रहा है जब ईश्वर हरेक से पूछते है की तुम्हे स्वर्ग में क्यों आने दिया जाए और टीचर कहता है मै एक अध्यापक हूँ बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ अपने काम गिनवाना शुरू करता है लम्बी लिस्ट जो ख़त्म ही नही होती और ईश्वर कहतें है अंदर आ जा पागल अब रुलाएगा क्या। इतने सारे चार्जेज के साथ अपना सिलेबस टाइम पर खत्म  करना और आह तक न भरना यही तो गुण है आज के टीचर के।

चलो शायद कभी हमारे भी दिन बदले और हमारे भारत में भी विदेश की तरह अध्यापकों को सम्मान पूर्ण स्थान मिलेगा इसी उम्मीद के साथ एक अध्यापिका ........... ।