Wednesday, 21 October 2015

अध्यापिका की ज़ुबानी...!

"माँ जन्म देती है गुरु जीवन देता है", टीचर्स डे पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने स्टूडेंट्स के साथ बातचीत में  जब ये वाक्य कहा तो लगा कि शायद गुरु शिष्य की परम्परा को फिर से जीवन मिलने वाला है। अगर हमारे देश के प्रधान मंत्री टीचर्स की रिस्पेक्ट करने की बात कर रहे हैं तो जरूर मआशरे में भी यही सन्देश जायेगा और हम जो टीचर्स अपनी खोयी हुई इज़्ज़त के साथ भी अपनी ड्यूटी को पूरी शिद्दत के साथ निभाते जा रहे हैं, थोड़ी बहुत कद्र हमारी भी समाज में हो जाएगी।

ऐसा नही है कि आज हर कोई टीचर कम्युनिटी के अगेंस्ट है आज भी बहुत से बच्चे अपने टीचर को इज़्ज़त देते है गुरु की कही हर बात उनके लिए मायने रखती है। पर ज्यादा संख्या अब उनकी होती जा रही हे जो ये समझते है कि पहले सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती थी अब नही होती या अब  टीचर्स को सैलरी तो ज्यादा मिलती है काम नही करते।   जबकि तब भी टीचर अपनी जॉब को ईशवंदना की तरह ईमानदारी से करता था आज भी वह उसी ईमानदारी के साथ अपने काम को पूजा की तरह से कर रहे है। 

पता नही क्यों सरकार खराब रिजल्ट आने पर टीचर्स पर सारा बलेम डाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। वही टीचर जो सारी जिंदगी बच्चों को शिक्षा देता रहा आज से कुछ ही साल पहले की बात है जब सरकारी स्कूल के पढ़े  बच्चे अच्छे कॉलेज में एड्मिशन लेते थे डॉक्टर्स ,इंजीनियर्स और बड़ी बड़ी पोस्ट होल्डर्स होते थे फिर आज अचानक वही टीचर निष्कर्मण्य कैसे हो गया क्या वो पढ़ाना भूल गया या पढाई इतनी मुश्किल हो गयी की अब वो पढ़ा नही पा रहा आखिर ऐसा हो क्या गया।

आज जो पॉलिसीज लागू की गयी है वो बच्चों में पढाई को महत्व न देते हुए ये सोचने लगे है कि जब फेल तो हो नही सकते तो क्यों मेहनत करनी वो बच्चे जो कल तक फर्स्ट आने के लिए या १०० में से १०० नंबर पाने के लिए मेहनत करते थे वो अपने साथ E1 ग्रेड लाने वाले बच्चे को अगली क्लास में बैठे हुए देखता है तो पूछता है कि मैडम फिर हम क्यों मेहनत करते है ? अब क्या जवाब दे एक टीचर अपने उस बच्चे को कि वो मेहनत क्यों  करे।

मिडिया जो अध्यापकों के विरोध में आने वाली हर न्यूज़ को तो ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर बार बार दिखाती है वो तब कहाँ जाती है जब कोई बच्चा नक़ल न करने देने वाले टीचर को हथियार से मार देता है या काम न करने पर या  बार बार काम मांगने वाले टीचर को बालों से पकड़ कर दिवार पर दे मारता है। मिडिया टीवी पर ये तो बार बार कहती है कि बच्चों के कौन से अधिकार है लेकिन कभी ये भी तो बता दो उन बच्चों को कि  उनके कुछ फ़र्ज़ भी है।

आज तक याद हे जब पेरेंट्स आ कर कहते थे मैडम हमने बच्चा आपको सौंप दिया अब आप ही इसका सब कुछ है बड़ा फख्र होता था अपने टीचर होने पर आज कोई अगर ये कहे कि  मुझे अध्यापक बनना हे तो मन करता है की कह दू "बेटा ये फटे का ढोल है न बजाए बने न फेंकते" मुस्कुरा कर रह जाती हूँ।

एक जोक याद आ रहा है जब ईश्वर हरेक से पूछते है की तुम्हे स्वर्ग में क्यों आने दिया जाए और टीचर कहता है मै एक अध्यापक हूँ बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ अपने काम गिनवाना शुरू करता है लम्बी लिस्ट जो ख़त्म ही नही होती और ईश्वर कहतें है अंदर आ जा पागल अब रुलाएगा क्या। इतने सारे चार्जेज के साथ अपना सिलेबस टाइम पर खत्म  करना और आह तक न भरना यही तो गुण है आज के टीचर के।

चलो शायद कभी हमारे भी दिन बदले और हमारे भारत में भी विदेश की तरह अध्यापकों को सम्मान पूर्ण स्थान मिलेगा इसी उम्मीद के साथ एक अध्यापिका ........... ।      

Tuesday, 15 September 2015

देर आए दुरुस्त आए


जिंदगी मे हर उम्र पर अलग तरह की खुशियां अलग तरह की चिंताए और अलग ही जरूरतें होती है। आज जब आस पास स्कूल में सुनती हूँ की बच्चों की रिजल्ट आने वाले है माएं परेशान है कि क्या होगा ? क्या रिजल्ट आएगा कहाँ एड्मिशन होगा मै अपने बच्चों के रिजल्ट एवं एड्मिशन के दिनों में पहुँच जाती हूँ।  आज ये समझ आता है कि मैने अपने बच्चों को पढ़ाई एक हौवा जैसा बना कर रखा था। 

क्लास टेस्ट में पुरे नंबर क्यों नही आये ये दो नंबर कहाँ कट गए क्यों कट गए हमेशा इसी बात के लिए नाराज़ होती रही ,वो जो १८ नंबर आये कभी उसके लिए खुश नही हुई बच्चों का होसला नही बढ़ाया कि कोई नही अगली बार आ जायेंगे १८ नंबर भी तो बहुत बढ़िया है। जैसे जैसे बड़ी हो रही हूँ ये समझ आ रहा है की मेने न सिर्फ अपनी टेंशन पाल रखी थी बल्कि कहीं न कहीं बच्चों से उनका बचपन भी छीन ही लिया था।
ईश्वर की कृपा से दोनों बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे थे आई० आई०  टी ० के आगे से निकलती तो सोचती मेरा बेटा बड़ा हो कर इंजीनियर बनेगा तो यहीं पढ़ेगा एम्स के आगे से निकलती तो सोचती की बेटी को डॉक्टर बनाऊँगी  तो वो यहां पढ़ेगी। असल में मैं  अपने बच्चो से अपनी जिंदगी की अधूरी इच्छाएं पूरी होने की उम्मीद करती थी।

वो सब तब गलत नही लगता था की क्या बच्चे ही तो माँ बाप की ख्वाहिशें पूरी करते हैं मैं कुछ  गलत थोड़ी सोच रही हूँ। सबसे खराब क्सपीरिएंस तो तब था जब बेटे का आई ० आई ० टी ० का रिजल्ट आना था और मै खुद ३ दिन तक सो नही पायी मुझे यही डर सता रहा था की अगर उसका आई ० आई ० टी ० में  एडमिशन नही हुआ तो क्या होगा? घबराहट व् टेंशन मे समझ ही नही आ रहा था कि अपना दर्द किससे कहूँ ? ईश्वर से हर घड़ी बस यही प्रार्थना कर रही थी की भगवान  इस बार बचा लो आगे जिंदगी में  अपने साथ साथ किसी की जिंदगी हराम नही करुँगी। आखिर वो दिन आया जब रिजल्ट डिक्लेअर होना था।  फ़ोन की घंटी बजती मेरा कलेजा मुँह को आ जाता कि न जाने क्या होगा फ़ोन की घंटी बजी और इन्होने कहा कि  हमारा बेटा सेलेक्ट हो गया। ऐसा लगा कि मुझे सब कुछ मिल गया। इतना रोयी कि घर में सब हैरान कि इतनी ख़ुशी की बात और मै थी कि  रोये ही जा रही थी सब मुबारक बाद दे रहे थे और मै अपने मन में ये प्रण कर रही थी कि ईश्वर मुझे इतनी बुद्धि देना की जो हुआ सो हुआ आगे से मैं अपने बच्चों को इस तरह से टेंशन न दूँ।

बस वो दिन है और आज का दिन मेने बच्चों की छोटी छोटी उपलब्धियों पर भी खुश होना सीख लिया है बिटिया को जो तू चाहती है वो कर यह कह कर खुद भी रिलैक्स रही और किसी को भी टेंशन नही दी। अब तो स्कूल में पेरेंट्स को भी यही समझाती हूँ की हर बच्चे में अलग विशेषता होती हे हर बच्चा कुछ न कुछ जरूर बनता है। 

हाँ ये सच है की ये सब सीखने के लिए मेने बहुत बड़ा एग्जाम दिया। सच ही तो है देर आए दुरुस्त आए।   

Thursday, 10 September 2015

मालपुआ बनाने की विधि


आज शाम से बारिश हो रही थी सोचा बिटिया को कोई अच्छी चीज़ बना कर खुश कर दूँ। फिर सोचा कि क्या बनाया जाये तो याद आया माँ भी ऐसे मौसम में अक्सर मीठे मालपुए बनाया करती थीं। बस फटाफट सामान इकठ्ठा किया और बना लिए टेस्टी टेस्टी मीठे पूड़े। आइये आप भी बनाइये मालपुए माँ की रेसिपी से। 


सामग्री ;-१ कप आटा (गेंहू का)
              १ /२ कप चीनी
              १ से १ १/२ कप पानी
              १ चम्मच सौंफ
              रिफाइन्ड  तेल (नॉन स्टिक तवे पर तलने के लिए)    


विधि ;-एक पैन  में १ कप पानी में चीनी और सौंफ डाल कर गैस पर रख कर तब तक हिलाएं जब तक चीनी घुल जाये फिर उसे ठंडा होने रख दे।
एक बड़े कटोरे में आटा डाल कर थोड़ा थोड़ा चीनी का मिश्रण डालते हुए आटे को मिक्स करे। 


ये ध्यान रखे कि आटे में गिलटियां न पड़े। मिश्रण को मिलाते मिलाते स्मूथ सा पेस्ट बना ले। यह मिश्रण पकोड़ों के बेसन जितना स्मूथ होना चाहिए। 

इस मिश्रण को लगभग ५ मिनट तक फेंटे ताकि मालपुए सॉफ्ट बनें। 
एक फ्लैट तवे पर थोड़ा सा तेल डाल कर करछी से मिश्रण तवे पर डालें। 

माध्यम आंच पर सिकने दे चिमटे की सहायता से पलट कर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक तलें। 

लीजिये तैयार है मालपुए। 

मालपुए को खीर या रबड़ी के साथ भी खाया जा सकता है। नही तो आम के आचार के साथ इन पुओं के मजे लीजिये। 

Friday, 4 September 2015

आप मेरी माँ ही हैं ना

कभी कभी मसरूफ जिंदगी में कुछ ऐसा घट जाता है जो सोचने के मजबूर कर देता हे कि क्यों ईश्वर किसी को हर ख़ुशी से महरूम क्यों कर देता हे क्यों ये मासूम बच्चो से उनके माँ, बाप को दूर कर देता है।

एक टीचर की ड्यूटी निभाते हुए बहुत से बच्चों से मिली जिनके जीवन मे  ईश्वर से  कोई न कोई नाइंसाफी की हुई थी पर आज से बहुत साल पहले दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली पिंकी प्रार्थना में गर्मी से बेहोश होकर गिर पड़ी उसे उठा कर मेडिकल रूम में ले गयी ग्लूकोस वगेरह दिया। फिर घर में फ़ोन कर दू ये सोच कर उठी ही थी पिंकी की आवाज़ से चोंक गयी कह रही थी मेम प्लीज मेरे घर फ़ोन नही करना मुझे घर नही जाना। मै हैरान रह गयी क्यों ? बस मुझे नही जाना घर, मैं  यही रहूंगी।  अच्छा, मै  उसे मेडिकल रूम में छोड़ कर क्लास में आ गयी। पर मन में यही सवाल घूम रहा था कि  क्यों पिंकी ने घर जाने को मना कर दिया। तभी राधा बोली मेम आपको पता हे की पिंकी घर से कुछ खा कर नही आती। उसकी मम्मी उसे कुछ खाने को नही देती की स्कूल  में मिड डे मील मिलेगा तो वही  खा लेना सारा काम करती है  घर का ऊपर से मारती भी है उसे। क्यों ? मेरे हैरान प्रश्न पर  सब ने हंस कर कहा कि उसकी अपनी मम्मी नही हैं ना .………

अगले दिन से पिंकी मेरे लिए स्पेशल स्टूडेंट हो गयी पढ़ाई में तो अच्छी थी ही वो मेरे थोड़े से प्यार और एक्स्ट्रा अटेंशन ने उसे और निखार दिया। हर कम्पटीशन में पार्ट लेना जीत कर आना और अपने सारे अवार्ड्स  मुझे दिखाने को बेताब पिंकी हर घड़ी मेरे आस-पास होती। उसकी उपस्थिति मुझे सुकून देती थी।       "आठवी के बाद नही पढ पाऊँगी क्योंकि माँ ने मना कर दिया है", ये शब्द मुझे अंदर तक चीर गए पूछ भी नही पायी कि  क्यों ? इतनी होशियार बच्ची इस तरह सौतेली माँ के दुर्व्यवहार के कारण पढ़ नही पायेगी लेकिन मै क्या करूँ नही सोच पा रही थी। पापा को बुला कर बात भी की पर नतीजा सिफर।

ईश्वर से दुआ करती कोई रास्ता दिखाओ मुझे। "पिंकी तुम्हारी मम्मी तुम्हे प्राइवेट पढ़ाई तो करने देंगी ना, मै तुम्हारी पूरी मदद करुँगी"। "पता नही" रुआंसी सी पिंकी बोली। १० वीं की पढ़ाई फिर १२ वीं के पेपर्स प्राइवेट दे कर पूरे जोन में प्रथम आने वाली पिंकी तब तक मेरे कॉन्टेक्ट में  थी हर कठिनाई मुझसे शेयर करने वाली पिंकी एक दिन आई और रोते  हुए बोली गॉव जा रही हूँ अब कभी नही मिल पाऊँगी। अरे  रोते  नही  अब तुम बड़ी हो गयी हो अब तुम्हे मेरे सहारे की जरूरत  नही है अपना रास्ता खुद तलाश करो।

इतने साल बाद न्यूज़ पेपर की हैडलाइन पर नजर टिक गयी यू० पी ० के छोटे से गॉव की पिंकी आई ० ए ० एस ० के एग्जाम में सेलेक्ट हुई थी। मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नही था मेरे पैर जमीन पर नही पड़ रहे थे। पति को ये खुश खबरी सुनाने को फ़ोन उठाया ही था कि वह घन घन बज उठा। पिंकी थी "मेम मैंने आपका सपना पूरा कर दिया। मैंने शादी के बाद भी पढ़ाई नही छोड़ी। इसके लिए ही तो आपने  मेरी इतनी मदद की थी ना। मुझे अपनी माँ का सपना पूरा करना था। मैंने सबसे पहले अपनी माँ को बताने के लिए फ़ोन किया। आप मेरी माँ ही हैं ना। आप मेरी माँ ही हैं ना। "   ...........  और मैं ना जाने क्या सोच रही थी मेरा थोड़ा सा प्यार किसी बच्ची की जिंदगी को इस मुकाम पर ले आएगा।

सचमुच आज मुझे मेरे टीचर होने पर फक्र  हो रहा है। 

Wednesday, 2 September 2015

औरंगजेब बनाम अब्दुल कलाम


आजकल न्यूज़ मे यह खबर बार बार आ रही थी की औरंगजेब रोड का नाम बदल कर भारत के पूर्व राष्ट्रपति  ए० पी० जे० अब्दुल कलाम रोड किया जाये ऐसी मांग उठ रही है। शुकवार को नई दिल्ली नगर निगम के उप सभापति श्री करन सिंह तंवर ने कहा कि सदन में औरंगज़ेब रोड का नाम बदल कर पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर करने के लिए सभी ने सर्व सम्मति से प्रस्ताव पारित कर दिया। दिल्ली के मुख्य मंत्री भी एन० डी० एम ० सी०के सदस्य है इस मीटिंग में मौजूद थे। उन्होंने भी ट्वीट कर हर्ष व्यक्त किया।

औरंगज़ेब रोड का ही नाम क्यों चेंज करके उसे रीनेम किया  जाये इसके जवाब में अजीब अजीब वक्तव्य आये जिसमे किसी ने औरंगज़ेब को क्रूर शासक बताया इसलिए उसके नाम के बजाय उस रोड को अब्दुल कलाम नाम देना ठीक रहेगा।

१९११ से १९३१ के बीच जब नई दिल्ली की  रोड्स एवं पार्क्स को नाम देने के विषय में योजना बनाई तो दिल्ली की ऐतिहासिक सम्पदा को जीवित रखना चाहते थे सो उन्होंने कई लोदी ,तुगलक ,मुग़ल ,हिन्दू ,मंगोल,पठान व् राजपूत लगभग इतिहास के सभी वंशजों जिन्होंने ने भी दिल्ली के इतिहास में कोई योगदान दिया था उनके नाम पर नामकरण किया तो उन्होंने बिना पक्षपात के इंडिया गेट के चारों तरफ की रोड्स को पृथ्वीराज चौहान ,अशोक ,औरंगजेब, शाहजहाँ व् शेर शाह सूरी आदि के नाम पर नाम रखे।

डॉ ए० पी० जे० अब्दुल कलाम हमारे देश की ऐसी शख्सियत है कि उनके नाम पर किसी रोड किसी बिल्डिंग किसी पार्क का नाम रखा जाये तो किसी भी हिंदुस्तानी को एतराज नही होगा किन्तु यदि किसी रोड का नाम बदलने के बजाय किसी महत्वपूर्ण रोड का नामकरण उनके नाम पर किया जाता तो शायद श्रद्धांजलि देने का ये तरीका ज्यादा उपयुक्त रहता। मैं तो कहती हूँ की इस तरीके से तो ज्यादा बेहतर तरीका होता यदि हमारी सरकार देश के गरीब योग्य बच्चों को आगे पढ़ने के लिए कलाम साहेब के नाम पर स्कालरशिप देती। विज्ञानं विषय में  महत्वपूर्ण खोज करने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करती या फिर उस मिसाइल मैन को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका ये भी हो सकता है कि हमारी अगली मिसाइल का नाम उनके नाम पर हो।

हर चीज पर राजनीतिक सियासत करने के बजाय यदि हमारे सियासतदान उन्हें सच्चे मन से याद करने के लिए कोई कोई स्कूल जहाँ  विज्ञानं की खोजों के लिए उत्तम लैब्स जो आधुनिक उपकरणों से लैस हो खोलें तथा वहाँ बच्चे अपनी योग्यता के आधार पर एडमिशन पा  सकें तो डॉ ० कलाम की आत्मा ज्यादा प्रसन्न होगी।

डॉ० कलाम हमारे देश के गौरव है,थे और रहेंगे ओ सियासतदानों उनके नाम पर राजनीति मत करो वो तो ऐसी शख्सियत थे जो राजनीति के गहरे कुए से भी बेदाग निकल कर आये थे।  

Monday, 31 August 2015

शुक्रिया


आज स्कूल  से घर आकर टीवी चलाया तो ज़िंदगी चैनल पर शुक्रिया प्रोग्राम आ रहा था।  प्रोग्राम मे एक पोती अपने दादा और दादी का शुक्रिया करते हुए "फलेश-मॊब" एक्ट करती है। उसके अनुसार उसके दादा और दादी ने उसे जीवन में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी इसलिए वो उनका शुक्रिया कर रही है।

मुझे उसी पल यह एहसास हुआ कि मुझे भी अपनी जिंदगी में इस मुकाम पर लाने वाले मेरे पति का मैंने कभी शुक्रिया नहीं किया। मैं  आज  याद करती हूँ ३२ साल पहले १९ वर्ष की उम्र में जब पढ़ाई करते-करते ही मम्मी -डैडी ने विवाह करके रुखसत कर दिया था, उस वक्त मेरा हाथ थामा मेरे पति ने। नया घर, नए लोग, सब कुछ नया  - ना अपने घर जैसा माहौल, ना खानपान - सब कुछ बदला बदला सा था।

ऐसे समय में इन्होने अपने परिवार के नियम-रिवाज़ सबसे मेरा परिचय करवाया। कभी यह एहसास ही नही होने दिया कि मैं इस घर में नई हूँ। मेरे परिवार को अपना परिवार मान कर हर काम हर अवसर पर मदद की। इन्होने कभी मुझे किसी चीज़ के लिए नही रोका बल्कि आगे बढ़ कर मेरी मदद की।  मेरी पढाई पूरी करवाई  बी० एड ० करवाया तथा मेरे जैसी अंतर्मुखी , सकुचाई सी लड़की को टीचर्स रिक्रूटमेंट एग्जाम दिलवा कर जॉब में लगवाया एवं आत्मनिर्भर बनाया। किस मौके पर हमें  किस तरह से पेश आना है, किसी मुश्किल परिस्थिति पर कैसे रिएक्ट करना है सब मैंने अपने पति से सीखा।

मेरे व्यक्तित्व का जो भी पहलु आज सबके सामने है, सब इनकी ही देन है। आपके हर सपोर्ट के लिए आपका  बहुत बहुत शुक्रिया खन्ना साहिब।                                                                                  

Friday, 28 August 2015

वक़्त की कीमत


 सारा दिन बिस्तर पर बैठे रहो कुछ न करना हो सोच कर बड़ा मज़ा आता है ना । पर मेरा यकीन मानिये कि अगर आपको जबरदस्ती बेड पर बिठा दिया जाये कि आपको कुछ नही करना सिर्फ रेस्ट करना है ऐसा लगता है किसी ने सज़ा देदी है। बिल्कुल ऐसा आजकल मेरे साथ चल रहा है।

 दो दिन पहले क्लास लेने जाने की जल्दी में टेबल से पैर टकरा गया ऐसा लगा कि  पूरा स्टाफ रूम गोल गोल घूम गया उस समय तो क्लास की टेंशन में सीढियाँ चढ़ती हुई ऊपर चली भी गयी। बाद वाली भी सारी  क्लासेज लेकर घर आने तक ये एहसास तो था कि पैर में थोड़ा सा दर्द है पर घर आकर जब आराम करने को मिला तो लगा कि  दर्द नार्मल से थोड़ा ज्यादा है।  शाम तक तो पैर सूज भी गया और दर्द भी बढ़ गया तो समझ आ गया की कुछ गड़बड़ हो गयी। इनके ऑफिस से घर आने पर बताने पर जो कुछ डांट पड़ने वाली है उसके बारे में सोच कर ही डर लग रहा था। वही हुआ तुम देख कर क्यों नही चल सकती हर समय जल्दी तुम्हे ही क्यों होती होती है अब भुगतो थोड़ा ध्यान से काम कर लो तो क्या बिगड़ जाता हे तुम्हारा ……। सर झुकाये अपराधी बच्चे की तरह डाँट सुन रही थी। जब ये शांत हुए तो अब चलें डॉक्टर के पास पूछा तो ये गुस्से में गाड़ी की चाबी ले कर बाहर निकल गए।

एक्सरे से ऊँगली मै  हेयर लाइन फ्रैक्चर कन्फर्म हुआ तो डाक्टर साहेब ने कहा प्लास्टर नही हो सकता। बैंडेज बांध दी साथ ही हिदायत दी कि  ५ दिन टोटल बेडरेस्ट पैर को लटकाना नही है। बस साहेब जी वो छोटी सी मेरी बेटी जो पानी का गिलास भर कर भी खुद नही पी सकती थी एकदम मेरा रूप धारण करके "बैठ जाओ, उठना नही। आपके बिना भी सब काम हो सकता है,बस आराम करो" आदि आदि बोल कर काम पर लग गयी। मन एकदम भर आया कि हम यही सोचते रहते है कि हमारी परवाह किसे है पर यहां तो नज़ारा ही अलग था दोनों पापा और बेटी खाना बनाना पानी भरना दूध लाना सारे  काम ऐसे कर रहे थे कि कहीं मैं किसी काम के लिए उठ न जाऊँ।

थोड़ी देर तक तो अच्छा लगा फिर थोड़ा सा उठ कर कुछ करने की कोशिश पर दोनों का झिड़क देना बैठी रहो रहो सजा जैसा लगने लगा।  ऐसा लगा कितनी मजबूर हो गयी हूँ  मैं। सारा दिन बिस्तर पर बैठी बस यही सोच रही हूँ  कि  भाई हम तो काम करते हुए ही भले। ईश्वर अगली बार ये ध्यान रखना की मुझे बैठे रहने से बहुत नफरत है प्लीज मेरे लिए ये सजा न मुकर्रर की जाये। मैं तो दौड़ते भागते शोर मचाते जल्दी जल्दी करो "ये क्या है, वो क्या है" अपनी टैग लाइन्स के साथ जीना चाहती हूँ।