आज उम्र के इस मोड़ पर खड़े हो कर पीछे देखती हूँ तो न जाने क्या क्या याद आता है कभी वो वीर का पेड़ की ऊपर की टहनियों पर चढ़ कर मीठे पके आम तोड़ कर चिढ़ाना कभी गुड़िया गुड्डे की शादी का खेल और ,कभी स्कूल से आते ही घर में कढम्ब यानी गांठ गोभी की वो खुशबु मन को गुदगुदा जाती है।
उस दिन बाजार सब्जी लेने गयी तो वो साथ नही थे गांठ गोभी देखते ही मन किया की एक बार बना कर खिलाऊँगी नही पसंद आई तो कोई बात नही। सो ले आई मनपसंद सब्जी और बना भी डाली की ट्राई करने में क्या हे ज्यादा से ज्यादा नही खाएंगे। शाम को डरते डरते पापा और इनके सामने परोसी क्या हे ये पूछने पर मेने कहा पापा खा कर बताइये कैसी है तब नाम बताऊँगी। यकीं मानिये पापा ने कहा बेटा ये तो बहुत स्वाद है बिलकुल नॉनवेज सा टेस्ट है। तब मेने उन्हें नाम बताया। अब अक्सर पापा और ये कहते है कि वो अपना वाला नॉनवेज बना देना अच्छा बना लेती हो। आप भी बना कर देखिये कि ये वेजिटेरिअन नॉनवेज आपको केसा लगता है।
सुबह सुबह डोरबेल बजते ही दिमाग दौड़ना शुरू कर देता है कि इस समय कौन आया होगा, स्कूल जाने का समय बिल्कुल बस निकलने ही लगी थी। "सुनो, जल्दी करो। मुझे देर हो रही है, आप आ कर अपना बैग सेट करना। पहले मुझे छोड़ दो।" "इस समय कौन होगा," बोलते हुए दरवाजा खोला तो देखा सामने मिसेज शर्मा खड़ी थी। हाथ में पर्स लिए, मुस्कुरा कर बोलीं, "मिसेज खन्ना, आप निकल रही है? मुझे कोई सवारी नहीं मिल रही। ऑड इवन के चक़्कर मे आज ये गाड़ी नहीं चला सकते। प्लीज, क्या मैं आपके साथ चल सकती हूँ?" "हाँ हाँ! क्यों नहीं! में भी बस निकल ही रही हूँ।" थैंक्स कह कर मिसेज शर्मा जल्दी से बैठ गई और हम स्कूल की तरफ चल पड़े।
रास्ते में मैं यही सोचती रही कि जब पिछली बार ऑड इवन स्कीम आई थी तो मैंने कोशिश की थी कि हमारे ब्लॉक की चार लोग एक ही तरफ जाते है और सबकी गाड़ियाँ सेम टाइम होने के कारण आगे पीछे ही चलती है तो हम सब क्यों न एक साथ बारी बारी से एक ही कार में चलें। यही सोच कर मैं सबसे पहले मिसेज शर्मा के पास बात करने गयी थी क्योंकि बाकी दोनों उन्ही के स्कूल की थी तो बात बन सकती है। पर मिसेज शर्मा का जवाब बड़ा अजीब सा था - "सुबह सुबह कोर्डिनेट करना बड़ा मुश्किल है और दूसरों के लिए रुक कर वेट करो मेरे हस्बैंड ये सब लाइक नहीं करते ,वैसे भी हमारे पास तो ऑड इवन दोनों नंबर की कार है। मुझे तो कोई दिक्कत नहीं है। आप उन दोनों से बात कर लीजिए।" मैने भी सोचा - छोडो, मुझे क्या पड़ी है।
"कल आप मेरे साथ चल लीजिएगा कल तो ओड नंबर कार चलेगी तो हस्बैंड छोड़ देंगे।" "नहीं नहीं कोई बात नहीं आप परेशान न हो मुझे तो ये छोड़ ही देते है, बेटे की गाड़ी का नंबर ऑड है।" "नहीं वो बात नहीं असल में हमने अपनी इवन नंबर वाली कार बेच दी, पुरानी हो गई थी। हमे क्या पता था की दिल्ली मे फिर से ये स्कीम लागू हो जाएगी। मुझे तो परसो फिर शामे दिक्कत का सामना करना पड़ेगा, इसीलिए कह रही हूँ की पूलिंग कर लेते हैं मैं उन दोनों से भी बात कर लूँगी।" "देख लीजिए, आपकी मर्जी।", कह कर मेने बात खत्म कर दी। उनको उनके स्कूल के गेट पर उतार कर इन्होने मुझे स्कूल छोड़ दिया।
मैं मन ही मन सीएम साहेब का शुक्रिया कर रही थी कि कम से कम ऑड इवन के बहाने ही सही लोगो मे इस बात की जागरूकता तो आई कि एक ही जगह एक ही समय आने जाने के लिए हम कार पूलिंग तो कर सकते हैं। इससे पेट्रोल की बचत, पोलुशन में कमी, सबसे बड़ा फायदा ये की पतिदेव को कुछ दिन तो छोडने लाने की ड्यूटी से आज़ादी मिल जाएगी। अब हम सब हर दिन एक कार में स्कूल जाती है। साथ जाने से बातचीत से पता चला कि अच्छे लोग हैं वो भी और तो और शाम को पार्क में सैर करने भी अब हम सब एकसाथ जाती हैं। एक कमी जो हमेशा लगती थी की मेरी कोई फ्रेंड नहीं है वो भी ख़त्म हो गई।
होली का असली मजा तो तब ही आता है जब हमें माँ के हाथों की गुजिया खाने को मिले। आपके बच्चे भी चाहते होंगे की आप उनके लिए गुजिया बनाएं। आइये हम मिल कर अपने बच्चों के लिए स्वादिष्ट गुजिया बनाएं।
लीजिये गुजिया की रेसिपी पेश है।
सामग्री:- आटा गूंथने के लिए १ कटोरी मैदा २ बड़े चममच सूजी २ बड़े चम्मच चीनी पानी में घोल लें २-३ बड़े चम्मच रिफाइंड मोयन के लिए भरावन के लिए २ बड़े चम्मच सूजी २५० ग्राम मावा , बूरा चीनी स्वादानुसार नारियल का बुरा ,किशमिश ,चारमगज काजू आदि आवशयकता अनुसार तलने के लिए रिफाइंड गुझिया बनाने का साँचा विधि;- बर्तन में मैदा सूजी व मोयन दाल कर मिक्स कर लें। इस आटे की मुठ्ठी बननी चाहिए इसका मतलब की मोयन ठीक डली है फिर इसको चीनी के पानी से कड़ा गूँथ लें और सूती गीले कपडे से कपडे से ढक कर रख दें।
अब कढ़ाई मे बिना घी डाले सूजी डाल कर धीमी आंच पर भून लें और बर्तन में निकाल ले। अब उसी कढ़ाई में मावा डाल कर भूनें गुलाबी होने पर गैस बंद कर दें। एक थाली में भूनी सूजी, भुना मावा, सूखे मेवे व बूरा चीनी मिक्स कर लें।
एक कटोरी में एक चम्मच मैदा दाल कर पतला सा घोल बना लें। आटे की छोटी छोटी लोइयाँ बना कर गीले कपडे के नीचे ही रखे। लोई से जितनी पतली रोटी बिल सकती है बेलें फिर रोटी को गुझिया के सांचे पर कर कार्नर पर मैदे का घोल दोनों तरफ लगा कर बीच में सूखा मिक्सचर भर लें सांचे को बंद करें बाहर रह गया मैदा हटा दे। तैयार गुझिया को तलने से पहले कपडे के नीचे रखें नही तो वो सुख कर फट सकती हैं इससे सारा घी खराब हो सकता है।
दूसरी कढ़ाई में रिफाइंड गर्म करे व बनी हुई गुझिया फ्राई करने के लिए इसमें डालें व धीमी आंच पर तलें। थोड़ी सी ब्राउन कलर होने पर टिशू पेपर पर निकल लें ताकि वो एक्स्ट्रा घी सोख ले। लीजिये तैयार हो गयी हमारी लज़ीज़ और क्रिस्पी गुझिया।
इस होली बच्चों को बनाई गुझिया से सरप्राइज कर दीजिये।
आजकल होली की धूम मची हुई है। गुझिया, चिप्स और मिठाइयाँ सबकी तैयारियाँ शुरू हो गयी हैं। बहू आज ही सुबह कह रही थी माँ बाजार में सब मिल जाता है फिर आप इतनी मेहनत क्यों करते हो? कैसे बताऊँ उसको की पहले तो कई दिनों पहले से घर में उत्सव जैसा लगने लगता था, साँझा परिवार होने की वजह से हर काम लार्ज स्केल पर होता था। चिप्स बनते तो सारी छत पर चादरें बिछा कर चिप्स सूखने डालना, माँ का हुक्म होता था सभी चिप्स अच्छी तरह से फैलाना। निगरानी रखना की चिड़िया चोंच न मार जाये, चुन्नी से ढक देना मिट्टी न पड़ जाए। आजकल तो थोड़ा सा बस शगुन करने जितना ही सामान बनाया जाता है।
खैर मुझे तो होली का नाम आते ही बचपन की वो ढेर सारी घटनाएँ ऐसे याद आ जाती हैं मनो कल ही की तो बात है। उस बार भैया की बोर्ड की परीक्षाएं थीं, माँ पिताजी का सख्त हुक्म था कोई होली वोली नही होगी। उसका ध्यान भी भंग होगा, कंसंट्रेट नही कर पायेगा। अच्छे नंबर लाने है उसे। "पर।", "कोई पर वर नही, कह दिया न"।और हम सब छोटे बच्चे डर के मारे एक कोने में छुप कर खुसर फुसर करने लगे। "ये भी कोई बात हुई, जैसे और किसी के पेपर नही होते। पता नही बड़े भैया ऐसे कौन से महान पेपर देने वाले है।" हम सबको यही लगने लगा था की माँ का तो पहले ही लगता था पिताजी भी बड़े भैया को हम सबसे ज्यादा प्यार करते है। इस बार की होली सूखी ही जाने वाली है। बस इतना सा रिएक्शन था बच्चों का........
सुबह सुबह पापा ने थोड़ा सा टीका कर होली का शगुन किया । होली मुबारक कह कर हम सबके माथे पर होली का टीका लगाया। और अपने कमरे में चले गए। और तभी दरवाजे पर बेल बजी, खोला तो छोटी बुआ रंगो के थैले हाथ में ले कर, मिठाई की टोकरी के साथ घर में घुसीं। "क्या त्यौहार के दिन भी दरवाजे बंद कर रखे है? बच्चे कहाँ हे सारे? कर्फ्यू क्यों लगा रखा हे घर में ???" "बुआ वो पिताजी ने होली खेलने से मना किया है, भैया के बोर्ड्स है न।""अरे हटो! पूरा साल इस त्यौहार का इन्तज़ार करते हैं", कहते कहते बुआ बाथरूम में घुस गयी। पानी की बाल्टी उठाई और जा पहुंची भैया के कमरे में, "विमल बाहर आता है या यही से बाल्टी से होली खेलनी है?" और हम सब बच्चे डर के मारे पिताजी के कमरे की तरफ देख रहे थे की अभी पिताजी बाहर आएंगे और बम फूटेंगे। "सुन रहा है तू या मैं अंदर आ जाऊँ?" "बुआ वो पिताजी..." और तब तक बुआ जी ने भैया को बाहर खींचा और रंग के पानी से सरोबार कर दिया। हम सब ख़ुशी के मारे चिल्लाने लगे और एक दूसरे को रंग मलने लगे। शोर सुन कर पिताजी गुस्से में कमरे से बाहर आये। बुआजी ने पीछे से गुलाल उनके ऊपर पलट दिया। बुरा न मानो होली है। सबकी हिम्मत बड़ गयी, कोई बुआ की आड़ लेकर गुलाल उड़ा रहा था, कोई मग से ही पानी दूसरे पर डाल रहा था।
"क्या भैया, ये क्या? पूरा साल पढाई की है। विमल के १ -२ घंटे होली खेलने से उसके नम्बर कम नही होंगे। सब बच्चों का मुँह देखो कैसे खिल गया है। विमल भी देखो कितना एन्जॉय कर रहा है। आपको क्या लगता है जब उसके सारे फ्रेंड्स होली खेल रहे है तो उसका मन पढाई में लगेगा?" "जा बेटा, थोड़ी देर बाहर खेल लो।"
वो तो बाद में पता चला कि माँ ने बुआ को होली पर लगे कर्फ्यू के बारे में बताया था और हमारे उतरे चेहरों के बारे में भी। वो जानती थी की सिर्फ बुआ ही हमे इस कर्फ्यू से रिलीज़ करवा सकती थी। उन्ही की बदौलत हमारी सुखी, खुश्क, बेमजा होली सबसे ज्यादा रंगीन, गीली और खुशगवार होली में बदल गयी। "थैंक्यू बुआ" कह कर हम सब बुआ से लिपट गए। मन ही मन सोच रहे थे की हमने अपने मन में बेकार ही ये सोच बना ली थी की माँ भैया को ज्यादा प्यार करती है, माँ के लिए तो सभी बच्चे बराबर और सबके लिए उसका प्यार बराबर।
"थैंक्यू माँ" अनायास ही मेरे मुँह से निकला। "क्या?" पति के इस प्रश्न पर मै वर्तमान में आ गयी। कुछ नही कह कर मुस्कुरा दी।
I’m pledging to #KhulKeKheloHoli this year by sharing my Holi memories atBlogAddain association with Parachute Advansed.
आज सुबह नींद खुलते ही कैलेंडर पर नज़र पड़ी ८ मार्च आज तो "इंटरनैशनल वीमेन'स डे" है। फ़ोन उठाया तो हर ग्रुप पर हैप्पी वीमेन'स डे के बड़े अच्छे मेसेजस थे। कहीं चेस की क्वीन, कहीं घर की धुरी, कहीं कुछ कहीं कुछ और मैं ये सोच रही थी कि क्या सिर्फ एक ही दिन सबको याद आता है कि महिलाये घर गृहस्थी को चलाती हैं? सारा साल क्या हम कुछ नही करते? लेकिन फिर यही सोचने लगी कि चलो एक दिन तो भाव मिल रहा हैं, एन्जॉय कर लो। आज मुझे कुछ मैसेज बहुत अच्छे लगे जिन्हे मै यहां शेयर करना चाहती हूँ नही जानती किसने रचा इनको बस मन को भा गये।
मैं क्या हूँ, ये सोचती खुद में डूबी हुई हूँ
मैं हूँ क्या????
कोई डूबते सूरज की किरण
या आईने में बेबस सी कोई चुप्पी
या माँ की आँखों का कोई आँसू
या बाप के माथे की चिंता की लकीर
बस इस दुनिया के समुन्दर में
कांपती हुई सी कोई कश्ती
जो हादसों की धरती पर
खुद की पहचान बनाते बनाते
एक दिन यूँ ही खत्म हो जाती है
चाहें हो पंख मेरे उड़ने के कितने
फिर भी क्यों
कई जगह खुद को बेबस पाती हूँ ?
शायद ये कवियत्री भी मेरी तरह एक दिन के सम्मान पर हैरान है।
तन चंचला
मन निर्मला
व्यवहार कुशल
भाषा कोमला
सदैव समर्पिता।
नदिया सा चलना
सागर से मिलना
खुद को भुला कर भी
अपना अस्तित्व सम्हालना
रोशन अस्मिता।
सृष्टि की जननी
प्रेम रूप धरिणी
शक्ति सहारिणी
सबल कार्यकारिणी
अन्नपूर्णा अर्पिता।
मूरत ममता
प्रचंड क्षमता
प्रमारित विधायक
सौजन्य विनायक
अखंड सहनशीलता।
आज का युग तेरा है परिणता
नारी तुझ पर संसार गर्विता।
ऐसे बहुत से विचार आज पढ़ने को मिले जो दिल को छू गए। सभी रचियताओं की अद्वितीय रचनाऍ हैं जिनसे कभी अपनी बेबसी और कभी अपने महिला होने पर गर्व महसूस हुआ। ऐसे रचनाकारों को मेरा नमन।
आज 'नो एग्जामिनेशन डे' था - बच्चे तो थे नहीं, सो हम सब स्टाफ रूम में बैठे इधर उधर की गप्पें मार रहे थे। बातें बजट से शुरू हुई कि बजट मे क्या अच्छा लगा और क्या पसंद नही आया। फिर टीवी, बॉलीवुड से होती हुई और परिवार पर जा पहुँची। "मैडम आप इतनी सुबह क्यों उठ जाते हो" इधर से एक ने पूछा, जब तक वो जवाब देतीं तब तक दूसरी मैडम बोल उठी "बेचारी सारा काम खुद जो करती हैं।" "मतलब?", हैरानी से पूछा सुजाता ने जो अभी अभी स्टाफ रूम में दाखिल हुई थी। "अरे इनकी किस्मत तुम्हारे जैसी थोड़ी है जो घर के कामों में कोई हाथ बंटा दे ,घर के सारे काम ये खुद करती हैं।" "वो तो सभी करते हैं, इसमें क्या बड़ी बात है?" इन सारी बातों के बीच सुजाता ने कहा कि "आपको क्या लगता है कि मेरे लिए ये सब इतना आसान रहा होगा कि पुराने विचारों वाले परिवार में अपनी जगह बनाना और पति से काम में मदद करवा लेना वो भी संयुक्त परिवार में, फिर ??"
सुजाता ने जो आप बीती सुनाई वो मैं आप सबको उसी की जुबानी सुना रही हूँ।
"जब मेरी सगाई इनसे हुई तो मै बहुत खुश थी। सुन्दर, स्मार्ट, अच्छी नौकरी, अच्छी तनख्वाह, छोटा सा परिवार, पढ़े लिखे सास ससुर और क्या चाहिए किसी को भी। बस मेरे सपने हकीकत में बदल रहे थे। शुरू शुरू में तो सब कुछ बहुत बढ़िया था, लेकिन उस दिन मेरे पैरों के नीचे से जमीं ही खिसकगयी जब सासु माँ ने कहा कि "बेटा थोड़ा घर का भी ध्यान देना शुरू करो। तुम्हारी छुट्टियाँ भी ख़त्म होने को हैं, हम भी कब तक तुम्हारा ध्यान रख सकते हैं। अपना काम खुद करना शुरू करो।" "हाँ जी" कह कर मै अपने कमरे में आ गयी।
जब मेरे स्कूल शुरू हुये तो मेरी मुश्किलें शुरू हो गयी। सुबह कपडे धो कर फैलाने का टाइम नहीं, खाना बन गया तो पैक नही कर पायी। कभी हस्बैंड से कहा की प्लीज हेल्प कर दिया करो तो उनका कहना कि "मम्मी पापा क्या कहेंगे कि बीवी की मदद कर रहा हूँ।" "तो?" वो बिना कोई जवाब दिए निकल जाते। मै उसी तरह अनाड़ी की तरह एक काम सही करती तो दूसरा बिगाड़ देती। सब कुछ बदल रहा था, घर का माहौल भी रिश्ते भी। मैं कुछ नही कर पा रही थी। एकाध बार माँ से जिक्र किया तो माँ ने भी यही जवाब दिया कि घर का काम तो औरत को ही करना होता है।
सब के बीच मै कहीं टूट रही थी घर मुझसे सम्हाल नही रहा था। स्कूल का काम टाइम से पूरा नही हो रहा था और मै डिप्रेशंन में आती जा रही थी। डॉ. से मिलकर प्रॉब्लम डिसकस की तो डॉ ने इनसे पूछा क्या घर में सब ठीक है? "हम्म ठीक ही है, बस मैडम ही अपसेट हैं।" "सुजाता मुझे बताओ कि तुम्हें क्या परेशानी है?" "कुछ नही। जब मैं सब ठीक करने की कोशिश करती हूँ तो बाकी सब गड़बड़ हो जाता है। मै कुछ भी सही नही कर पाती।"
डॉ. ने मेरे पति से कहा की जब ये काम करने में घबरा जाती है तो आप क्या मदद नही करते? "घर के काम तो इसी को करने हैं, मैं तो पुरुष हूँ। मेरा काम पैसा कमाना है, न कि कपडे सुखाना या लंच पैक करना।" "क्यों? ये सब सिर्फ इसी का काम क्यों है? चलो मान लिया फिर नौकरी करना इसका काम क्यों है? ये दो जगह काम करे और दोनों जगह पूरे समर्पण के साथ और आप, आप की तो शान कम हो जाएगी ज़रा सी मदद कर देंगे, तो ठीक है। सुजाता आप भी छोड़ दो नौकरी इन्हे आपके पैसे की कोई मदद नही चाहिए। ठीक कह रही हूँ न मैं? आप एक दिन इसे खो देंगे वर्ना अपनी झूटी ईगो से बाहर आ जाइये। इलाज की जरूरत इसे नही आपको व आपके परिवार को है।"
ना जाने उस डॉ. की बातों का असर था या सच में मुझे खो देने का डर, अगली सुबह चाय प्याली ले कर मेरे पति मुझे जगाते हुए बोले, "उठो स्कूल को देर हो जाएगी" और मैं डर कर बाहर देखने लगी की मम्मी देख लेंगी तो क्या कहेंगी? और ये हँस कर बोले कि मेने मम्मी को तुम्हारी प्रॉब्लम बताई तो मम्मी ने खुद मुझे कहा हे कि अगर मुझे तुमसे नौकरी करवानी है तो तुम्हारी मदद करूँ। और बस उस दिन से हम सब मिल कर घर में काम करते हैं।
और मैं ,मैं ये सोच रही थी ईश्वर का लाख लाख धन्यवाद कि उसने सुजाता के परिवार के लोगों को मिलकर घर चलाने की बुद्धि प्रदान की नही तो मैं इतनी प्यारी सहेली से कभी न मिल पाती।
I am joining the Ariel #ShareTheLoad campaign at BlogAdda and blogging about the prejudice related to household chores being passed on to the next generation.
"न जब तक पूरे न हो फेरे सात" रेडियो पर ये गाना चल रहा था। "सात फेरे धरो बबुआ भरो सात वचन भी" यह सुनते ही हंसी आ गयी कि ३५ साल पहले जब हमारी शादी हुई थी तब भी तो पंडितजी ने वचन भरवाये थे। तब तो श्रीमान जी बड़े आज्ञाकारी की तरह पंडितजी के पीछे पीछे वचन दोहरा रहे थे, उसके बाद कभी कोई वचन याद भी होगा ऐसी उम्मीद मुझे नही रही। बिना कोई वादा किये हम दोनों अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारियाँ पूरी कर रहे है। ईश्वर की कृपा से न कभी मुझे उन वचनों को याद करवाने जरूरत हुई न किसी उलाहने की, कि आपने ये वादा पूरा नही किया। अपने भरे पूरे परिवार के साथ मै बहुत खुश हूँ। पर जब अपनी सहेलियों की बातें सुनती हूँ कि उसके पति ने उससे ये वादा किया तो सोचती हूँ कि अगर कभी मुझे अपने पति से कुछ कसम भरवानी हो तो वो क्या होंगी ?? शायद इनमे से कुछ :-
जब भी ये अपने भाई बहिनो के साथ होते है तो कभी मेरे मोटापे को लेकर कभी मेरे सफ़ेद बालों को लेकर मजाक करते है। ये तो मानने वाली बात है हमारे परिवार में मुझे छोड़ कर कोई मोटा नही है पर सबके सामने इनकी सेहत का राज यही तो है कहना मुझे कॉन्शियस कर जाता है तो सबसे पहली कसम तो इन्हें यही दिलवानी है की मेरी सेहत मजाक कभी नही उड़ाएंगे।
गीला तोलिया नहाने के बाद बेड पर छोड़ देना कभी गलत ही नही लगा साहेब को चाहें हम कितना ही कुनमुनाते रहें। नहा कर टॉवल बाहर ही फैलाएंगे ये वादा करना होगा साहेब जी।
मोबाइल मेरे हाथ में देखते ही गुस्से से लाल पीले हो जाते हैं। कभी कभी ये जोक सच लगता है सारा दिन सब काम करो पर जैसे ही फ़ोन हाथ में लो सब ऐसे देखते है कोई गुनाह कर रहे हैं। तीसरी कसम चाहिए कि मैं जब चाहूँ जितनी देर चाहूँ फ़ोन पर गेम खेलूं चैट करूँ ये मुझे डिस्टर्ब नही करेंगे :)
और हाँ जब भी मेरी फ्रेंड्स घर आती हैं आप मुझे किचेन में कुछ अच्छा सा बनाओ ये कौन सा रोज़ तुम्हारे आती हैं कह कर भेज देते हैं और उनके साथ गप्प मारने में बिजी हो जाते हैं। मै किचन में चाय नाश्ता तैयार करती हूँ और ये मजे से दुनिया भर की बातें बनाते हैं। ऐसा लगता है की वो मुझसे नही इनसे मिलने आई है। इनसे ये वादा कि जब फ्रेंड्स आएं ये गप्पे मारने के बजाय उनके आवभगत की जिम्मेदारी खुद लें।और मै अपनी फ्रेंड्स के साथ एन्जॉय करूँ :)
बस और कुछ नही करवाना मुझे :) एक्चुअली मेरे वो मिस्टर परफेक्ट हैं। जैसे भी है मेरे पति मेरे देवता हैं।
आज सुबह से ही तबियत कुछ ढीली सी लग रही थी। क्लास मे भी खड़े रह कर पढ़ाना और फिर एग्जाम का प्रेशर बच्चों को बार बार प्रैक्टिस टेस्ट देना, लग रहा था कि शरीर में अब और ताकत नही बची कि घर जाकर कुछ कर पाऊँगी। जैसे तैसे स्कूल में छुट्टी की घंटी बजी और मैं घर जाने की जल्दी में निकली।
बाहर निकलते ही रिक्शा मिला शुक्र मनाया नही तो कई बार तो रिक्शा के इंतजार में ही दस पंद्रह मिनट लग जाते हैं। रिक्शा पर बैठते ही घर की वस्तु स्थिति सामने घूमने लगी मेरे स्कूल चले जाने के बाद पतिदेव ने नहा कर तौलिया वहीं छोड़ दिया होगा। किचेन अंदर घुसते ही मुंह चिढ़ाती सी प्रतीत होती है जैसे वो भी इसी इंतजार मैं बैठी होकि अभी मैडम आएँगी तो मुझेभी साफ सफाई करके मेरी रौनक वापिस लायेंगी। और उधर मैले कपडे जिन्हे सुबह जल्दबाज़ी में छोड़ आई थी की दिन में आ कर देखूंगी आँखों के अँधेरा छा रहा था। चलो पहले घर तो पहुँच जाऊँ फिर देखी जाएगी क्या करूंगी। "मैडम किधर जाना है"आवाज़ से तन्द्रा भंग हुई। "सीधे हाथ मोड़ कर रोक देना भैया, धन्यवाद"।
पर्स में से चाबी निकलने लगी तो याद आया आज तो बेटा घर पर है कल ही तो आया है बनारस से, वो हॉस्टल में रहता है कभी कभार लॉन्ग वीकेंड हो तो आ जाता है। घंटी बजते ही बेटे ने दरवाजा खोला उसका मुस्कुराता चेहरा देख कर आधी थकान तो वैसे ही उतर गयी। "उठ गया बेटा? कुछ खाया तूने? मैं जल्दी से कुछ बना देती हूँ अभी", पर्स रखते हुए बोली। मेरी आँखों को खुद पर यकीं नही आ रहा हो जैसे ऐसे खुली की खुली रह गयी। कमरा एकदम साफ, बिस्तर करीने से लगा हुआ, शीट्स तह कर के रखी हुई। "ये क्या आज तूने बिस्तर सम्हाले?" "हाँ जी, क्यों?" बेटे ने बड़ी हैरानी से पूछा। मैं हैरान सी आँखों से उसे देख रही थी बाहर देखा तो कपडे सूख रहे थे अब तो मुझे लगा सपना देख रही हूँ।
मुझे यकीं नही हो रहा था क्योंकि मेने तो बेटे को कभी काम करते नही देखा था और हमारे घर के रिवाजों के हिसाब से लड़के काम नही करते। कभी आधी रात में पानी भी चाहिए हो आवाज़ लगा कर मांगने वाला बच्चा आज माँ के सारे काम कर दे, ये तो बिलकुल ही अप्रत्याशित सा था। मैं कुछ कहती इससे पहले वही बोला "मम्मी, आप इतनी हैरान क्यों हो रही हो? अब मैने हॉस्टल में जाने के बाद इस चीज़ को समझा कि आप हमारे सारे काम कितनी सहजता से कर लेती। आप तो कभी ये भी नही कहते कि मैं थकी हूँ मैं नही करुँगी। पर मै जब क्लास से वापिस रूम पर आता था तो फैला बिस्तर, कपडे सब सम्हालने की हिम्मत भी नही होती थी। फिर मेने फैसला किया की सुबह ही सब ठीक कर लिया करूँगा।"
" मुझे आपकी बहुत याद आती थी। साथ ही मन में ये बात भी कि मम्मी ने क्यों नही हमसे कभी काम करने को कहा अकेली ही सब कुछ करती रहीं। आपने मुझे पापा को क्यों नही कहा कि आप भी थक जाते हो हमें भी आपका हाथ बंटाना चाहिये। अब वक़्त बदल चुका है माँ जब आप हमारे लिए बाहर जाकर काम कर सकते हो तो हमे भी तो घर के कामों में आपकी हेल्प करनी चाहिए। अबसे हम सब मिल कर घर के और बाहर के सब काम करेंगे घर के काम सिर्फ आपकी जिम्मेदारी नही है माँ।"
और मैं, मैं तो जैसे आकाश में उड़ रही थी। जिंदगी भर तो यही सुनती रही जितना मर्जी पढ़ ले घर के काम तो तुझे करने ही पड़ेंगे मर्द थोड़ी घर का काम करते अच्छे लगते हैं। और आज मेरा बेटा मुझे ये एहसास करवा रहा है कि जब वर्क प्लेस पर हम सब एक समान हैं तो घर में क्यों नही। आसमान की तरफ देखते हुए बुदबुदा रही थी ईश्वर तेरे भी खेल न्यारे हैं कब क्या कर दे कुछ पता नही।
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घर मे नए मेहमान के आने की खबर मन को गुदगुदा जाती है। कल्पना मेँ बेबी के नाजुक से पैर, गुलाबी सी त्वचा, छोटी छोटी उँगलियाँ सब घूम जाता है तभी एक डर भी मन मे घर कर जाता है कि मैं अपने बच्चे की देखभाल कर भी पाऊँगी या नहीं। लेकिन जब मैं किसी को इस तरह की परेशानी मे देखती हूँ तो अपनी जिंदगी के कुछ अनुभव उनके साथ जरूर शेयर करती हूँ।
नन्हे बच्चे की मासूम गुलाबी स्किन की देखभाल सबसे ज्यादा जरूरी होती है तो सबसे पहले हमे उसके सोप, क्रीम, शैम्पू आदि पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। ये सब चीज़ें केमिकल्स रहित हो तथा इनसे बच्चे को किसी भी तरह से एलर्जी न हो इस बात का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। जिससे की यदि गलती से झाग बच्चे की आँख मे चली भी जाये तो बच्चो को जलन न हो।
बच्चे को नहलाने के लिए हमेशा गुनगुना पानी ही प्रयोग में लाना चाहिए। बच्चे को पानी के संपर्क में लाने से पहले ये भली प्रकार चैक कर ले कि पानी ना तो ज्यादा ठंडा हो ना ही ज्यादा गर्म। ज्यादा ठन्डे पानी से बच्चे को ठण्ड लगने का डर रहता है तथा ज्यादा गर्म पानी से जलने का खतरा भी हो सकता है तथा गर्म पानी से स्किन की नमी भी कम हो सकती है।
बच्चो को नहलाने के बाद सदेव मुलायम तोलिये से पोंछना चाहिए क्योंकि बच्चों की स्किन बहुत नाज़ुक होती है। कड़े तोलिये का प्रयोग उनकी स्किन को नुकसान पहुंचा सकता है इसके लिए पहले थोड़ा प्रयोग किया हुआ टॉवल भी सॉफ्ट रहता है।
बच्चों को नहलाने के बाद बेबी लोशन या मॉइश्चराइसिंग क्रीम का प्रयोग करना चाहिए ताकि सर्दियों में बच्चा ड्राइनेस से बच सके तथा कम्फ़र्टेबल फील कर सके। यदि बच्चे को कोई क्रीम या लोशन सूट न करे तो बेबी आयल से भी मालिश की जा सकती है। उस समय थोड़ा सा बेबी पाउडर भी सॉफ्ट पार्ट्स पर जरूर डाल देना चाहिए।
बच्चों को सबसे ज्यादा इर्रिटेशन गीले रहने पर होती है। पुराने समय में जब डाइपर्स नहीं होते थे तब जेंट्स के पुराने कुर्ते में से बच्चों की नैप्पी बनाई जाती थी। लेकिन तब भी बच्चे थोड़े समय में ही उसे गीला कर देते थे और बार बार बदलना पड़ता था जिससे बच्चे साउंड स्लीप नही ले पाते थे इस वजह से बच्चे और माँ दोनों परेशान रहते थे। लेकिन अब पंपेर्स प्रीमियम केयर पैंटीज तथा अन्य कई कम्पनीज की डाइपर्स मार्किट में उपलब्ध है जिससे बच्चे सूखा फील करते हैं तथा आराम से पूरी नींद ले पाते है। ज्यादा देर के लिए बाहर जाने पर भी डाइपर्स का प्रयोग एक अच्छा ऑप्शन है इससे सभी कम्फर्टेबल फील करते है। एक बात यहाँ भी ध्यान देने वाली है की बच्चोँ के डाइपर्स टाइम टू टाइम बदलते रहना चाहिए ताकि बच्चों को नैप्पी रेशेस न हो जाये और वो हँसते मुस्कुराते रहें।
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जब से बेटे की शादी हुई हर कोई जब भी मिलता यही पूछता और दादी कब बन रही हो मेरा जवाब यही होता कि जब ईश्वर की मर्जी होगी तभी। और वो दिन आ ही गया जब मेरी बहु रानी ने मुझे फ़ोन करके ये खुशखबरी दी कि माँ आपकी दिली इच्छा ईश्वर ने पूरी कर दी हमारी बगिया में नया फ़ूल जुड़ने जा रहा है। मैंने भरे गले से बच्चों को बधाई दी ईश्वर का शुक्रिया किया व सबकी सुखी स्वस्थ व समृद्ध जीवन की प्रार्थना की।
अब तो हर समय दिल में ख़ुशी के लड्डू फूट रहे थे लेकिन एक परेशानी भी मन में थी कि वर्किंग होते हुए मेरी बहु बच्चे को कैसे संभाल पायेगी उसकी ठीक से देखभाल कर भी पायेगी? लेकिन मन के किसी कोने से सदा यही आवाज़ आई की वो बहुत समझदार है मुझसे भी अच्छी तरह देखेगी वो, पर आप तो जानते हो सास तो सास है ऐसे कैसे अपनी बहु को कोई सीख न दे वो तो सास कैसी हुई? बैठ गयी पेन और पेपर लेकर की बच्चों की त्वचा की देखभाल कैसे करे ये बताने।
प्रिय बिटिया
सदा खुश रहो फलते फूलते रहो। बेटा मुझे तुम्हारी और बच्चे की बहुत फ़िक्र होती है। काश मै तुम्हारे साथ होती। पर क्योकि इस समय ये पॉसिबल नही लग रहा है सो सोचा कि तुम्हें कुछ खास बातें बता दूँ जिससे तुम्हे बच्चे की देखभाल में दिक्कत न हो।
सबसे पहले ये बताना चाहती हूँ कि जब तुम्हारे पतिदेव का जन्म हुआ था तब डॉ ने दादी को शहद चटाने को मना किया पर उन्हें लग रहा था कि ये तो हमारे रिवाज़ है तुम्हारी बुआ ने तब समझाया था कि हमे बच्चे की हेल्थ सबसे पहले है। बच्चों को माँ का पहला दूध पिलाना बहुत जरूरी है। बच्चे को माँ का दूध अमृत है। ये बच्चों का इम्यून सिस्टम को इम्प्रूव करता है।
बेटा बच्चों की त्वचा बहुत कोमल होती है.उनकी स्किन को गीले होने से बचाना बहुत जरूरी है। उन्हें सूती कपड़े से या सॉफ्ट तौलिये से ही सदा पोंछना चाहिए।
बच्चों को बेबी सोप से ही नहलाना चाहिए। पर कभी कभी बच्चों की त्वचा बेबी सोप से भी एलर्जिक होती है उस हालात कोई दूसरा सॉफ्ट सोप यूज़ करना चाहिए।
बच्चों की मालिश बेबी आयल से जरूर करनी चाहिए इससे उनकी स्किन शाइन करती हे तथा सॉफ्ट होती है बच्चे भी मालिश करवाने में बहुत एन्जॉय करते है।
बच्चे बार बार नैप्पी गीली कर देते है सबसे ज्यादा बच्चे नैप्पी गीली होने पर रोते है। आजकल तो डायपर आते है जो बच्चों को काफी समय तक गीलेपन का एहसास नही होने देते व् उनकी त्वचा को भी सूखा रखते है कहीं बाहर जाते समय या रात को बच्चे को आराम की नींद लेने के लिए डायपर पहनाया जाये आजकल पंपेर्स प्रीमियम केयर पैंट्स काफी मददगार साबित हो रहे है।मेरी सहेली ने मुझे पंपेर्स प्रीमियम केयर पैंट्स के बारे में बताया है की ये काफी देर तक बच्चों को सूखा रखते हैं।
मैं ये जानती हूँ कि मेरी बेटी बहुत समझदार है और वो मुझसे ज्यादा बच्चे की केयर रखेगी। ईश्वर तुम्हे सदा खुश रखे व अच्छी सेहत बख्शे ताकि तुम अपनी व अपने परिवार की भली प्रकार देखभाल कर सको।
ढेरो प्यार के साथ तुम्हारी माँ!
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"माँ जन्म देती है गुरु जीवन देता है", टीचर्स डे पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने स्टूडेंट्स के साथ बातचीत में जब ये वाक्य कहा तो लगा कि शायद गुरु शिष्य की परम्परा को फिर से जीवन मिलने वाला है। अगर हमारे देश के प्रधान मंत्री टीचर्स की रिस्पेक्ट करने की बात कर रहे हैं तो जरूर मआशरे में भी यही सन्देश जायेगा और हम जो टीचर्स अपनी खोयी हुई इज़्ज़त के साथ भी अपनी ड्यूटी को पूरी शिद्दत के साथ निभाते जा रहे हैं, थोड़ी बहुत कद्र हमारी भी समाज में हो जाएगी।
ऐसा नही है कि आज हर कोई टीचर कम्युनिटी के अगेंस्ट है आज भी बहुत से बच्चे अपने टीचर को इज़्ज़त देते है गुरु की कही हर बात उनके लिए मायने रखती है। पर ज्यादा संख्या अब उनकी होती जा रही हे जो ये समझते है कि पहले सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती थी अब नही होती या अब टीचर्स को सैलरी तो ज्यादा मिलती है काम नही करते। जबकि तब भी टीचर अपनी जॉब को ईशवंदना की तरह ईमानदारी से करता था आज भी वह उसी ईमानदारी के साथ अपने काम को पूजा की तरह से कर रहे है।
पता नही क्यों सरकार खराब रिजल्ट आने पर टीचर्स पर सारा बलेम डाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। वही टीचर जो सारी जिंदगी बच्चों को शिक्षा देता रहा आज से कुछ ही साल पहले की बात है जब सरकारी स्कूल के पढ़े बच्चे अच्छे कॉलेज में एड्मिशन लेते थे डॉक्टर्स ,इंजीनियर्स और बड़ी बड़ी पोस्ट होल्डर्स होते थे फिर आज अचानक वही टीचर निष्कर्मण्य कैसे हो गया क्या वो पढ़ाना भूल गया या पढाई इतनी मुश्किल हो गयी की अब वो पढ़ा नही पा रहा आखिर ऐसा हो क्या गया।
आज जो पॉलिसीज लागू की गयी है वो बच्चों में पढाई को महत्व न देते हुए ये सोचने लगे है कि जब फेल तो हो नही सकते तो क्यों मेहनत करनी वो बच्चे जो कल तक फर्स्ट आने के लिए या १०० में से १०० नंबर पाने के लिए मेहनत करते थे वो अपने साथ E1 ग्रेड लाने वाले बच्चे को अगली क्लास में बैठे हुए देखता है तो पूछता है कि मैडम फिर हम क्यों मेहनत करते है ? अब क्या जवाब दे एक टीचर अपने उस बच्चे को कि वो मेहनत क्यों करे।
मिडिया जो अध्यापकों के विरोध में आने वाली हर न्यूज़ को तो ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर बार बार दिखाती है वो तब कहाँ जाती है जब कोई बच्चा नक़ल न करने देने वाले टीचर को हथियार से मार देता है या काम न करने पर या बार बार काम मांगने वाले टीचर को बालों से पकड़ कर दिवार पर दे मारता है। मिडिया टीवी पर ये तो बार बार कहती है कि बच्चों के कौन से अधिकार है लेकिन कभी ये भी तो बता दो उन बच्चों को कि उनके कुछ फ़र्ज़ भी है।
आज तक याद हे जब पेरेंट्स आ कर कहते थे मैडम हमने बच्चा आपको सौंप दिया अब आप ही इसका सब कुछ है बड़ा फख्र होता था अपने टीचर होने पर आज कोई अगर ये कहे कि मुझे अध्यापक बनना हे तो मन करता है की कह दू "बेटा ये फटे का ढोल है न बजाए बने न फेंकते" मुस्कुरा कर रह जाती हूँ।
एक जोक याद आ रहा है जब ईश्वर हरेक से पूछते है की तुम्हे स्वर्ग में क्यों आने दिया जाए और टीचर कहता है मै एक अध्यापक हूँ बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ अपने काम गिनवाना शुरू करता है लम्बी लिस्ट जो ख़त्म ही नही होती और ईश्वर कहतें है अंदर आ जा पागल अब रुलाएगा क्या। इतने सारे चार्जेज के साथ अपना सिलेबस टाइम पर खत्म करना और आह तक न भरना यही तो गुण है आज के टीचर के।
चलो शायद कभी हमारे भी दिन बदले और हमारे भारत में भी विदेश की तरह अध्यापकों को सम्मान पूर्ण स्थान मिलेगा इसी उम्मीद के साथ एक अध्यापिका ........... ।
जिंदगी मे हर उम्र पर अलग तरह की खुशियां अलग तरह की चिंताए और अलग ही जरूरतें होती है। आज जब आस पास स्कूल में सुनती हूँ की बच्चों की रिजल्ट आने वाले है माएं परेशान है कि क्या होगा ? क्या रिजल्ट आएगा कहाँ एड्मिशन होगा मै अपने बच्चों के रिजल्ट एवं एड्मिशन के दिनों में पहुँच जाती हूँ। आज ये समझ आता है कि मैने अपने बच्चों को पढ़ाई एक हौवा जैसा बना कर रखा था।
क्लास टेस्ट में पुरे नंबर क्यों नही आये ये दो नंबर कहाँ कट गए क्यों कट गए हमेशा इसी बात के लिए नाराज़ होती रही ,वो जो १८ नंबर आये कभी उसके लिए खुश नही हुई बच्चों का होसला नही बढ़ाया कि कोई नही अगली बार आ जायेंगे १८ नंबर भी तो बहुत बढ़िया है। जैसे जैसे बड़ी हो रही हूँ ये समझ आ रहा है की मेने न सिर्फ अपनी टेंशन पाल रखी थी बल्कि कहीं न कहीं बच्चों से उनका बचपन भी छीन ही लिया था।
ईश्वर की कृपा से दोनों बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे थे आई० आई० टी ० के आगे से निकलती तो सोचती मेरा बेटा बड़ा हो कर इंजीनियर बनेगा तो यहीं पढ़ेगा एम्स के आगे से निकलती तो सोचती की बेटी को डॉक्टर बनाऊँगी तो वो यहां पढ़ेगी। असल में मैं अपने बच्चो से अपनी जिंदगी की अधूरी इच्छाएं पूरी होने की उम्मीद करती थी।
वो सब तब गलत नही लगता था की क्या बच्चे ही तो माँ बाप की ख्वाहिशें पूरी करते हैं मैं कुछ गलत थोड़ी सोच रही हूँ। सबसे खराब क्सपीरिएंस तो तब था जब बेटे का आई ० आई ० टी ० का रिजल्ट आना था और मै खुद ३ दिन तक सो नही पायी मुझे यही डर सता रहा था की अगर उसका आई ० आई ० टी ० में एडमिशन नही हुआ तो क्या होगा? घबराहट व् टेंशन मे समझ ही नही आ रहा था कि अपना दर्द किससे कहूँ ? ईश्वर से हर घड़ी बस यही प्रार्थना कर रही थी की भगवान इस बार बचा लो आगे जिंदगी में अपने साथ साथ किसी की जिंदगी हराम नही करुँगी। आखिर वो दिन आया जब रिजल्ट डिक्लेअर होना था। फ़ोन की घंटी बजती मेरा कलेजा मुँह को आ जाता कि न जाने क्या होगा फ़ोन की घंटी बजी और इन्होने कहा कि हमारा बेटा सेलेक्ट हो गया। ऐसा लगा कि मुझे सब कुछ मिल गया। इतना रोयी कि घर में सब हैरान कि इतनी ख़ुशी की बात और मै थी कि रोये ही जा रही थी सब मुबारक बाद दे रहे थे और मै अपने मन में ये प्रण कर रही थी कि ईश्वर मुझे इतनी बुद्धि देना की जो हुआ सो हुआ आगे से मैं अपने बच्चों को इस तरह से टेंशन न दूँ।
बस वो दिन है और आज का दिन मेने बच्चों की छोटी छोटी उपलब्धियों पर भी खुश होना सीख लिया है बिटिया को जो तू चाहती है वो कर यह कह कर खुद भी रिलैक्स रही और किसी को भी टेंशन नही दी। अब तो स्कूल में पेरेंट्स को भी यही समझाती हूँ की हर बच्चे में अलग विशेषता होती हे हर बच्चा कुछ न कुछ जरूर बनता है।
हाँ ये सच है की ये सब सीखने के लिए मेने बहुत बड़ा एग्जाम दिया। सच ही तो है देर आए दुरुस्त आए।
आज शाम से बारिश हो रही थी सोचा बिटिया को कोई अच्छी चीज़ बना कर खुश कर दूँ। फिर सोचा कि क्या बनाया जाये तो याद आया माँ भी ऐसे मौसम में अक्सर मीठे मालपुए बनाया करती थीं। बस फटाफट सामान इकठ्ठा किया और बना लिए टेस्टी टेस्टी मीठे पूड़े। आइये आप भी बनाइये मालपुए माँ की रेसिपी से।
सामग्री ;-१ कप आटा (गेंहू का) १ /२ कप चीनी १ से १ १/२ कप पानी १ चम्मच सौंफ रिफाइन्ड तेल (नॉन स्टिक तवे पर तलने के लिए)
विधि ;-एक पैन में १ कप पानी में चीनी और सौंफ डाल कर गैस पर रख कर तब तक हिलाएं जब तक चीनी घुल जाये फिर उसे ठंडा होने रख दे।
एक बड़े कटोरे में आटा डाल कर थोड़ा थोड़ा चीनी का मिश्रण डालते हुए आटे को मिक्स करे।
ये ध्यान रखे कि आटे में गिलटियां न पड़े। मिश्रण को मिलाते मिलाते स्मूथ सा पेस्ट बना ले। यह मिश्रण पकोड़ों के बेसन जितना स्मूथ होना चाहिए।
इस मिश्रण को लगभग ५ मिनट तक फेंटे ताकि मालपुए सॉफ्ट बनें।
एक फ्लैट तवे पर थोड़ा सा तेल डाल कर करछी से मिश्रण तवे पर डालें।
माध्यम आंच पर सिकने दे चिमटे की सहायता से पलट कर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक तलें।
लीजिये तैयार है मालपुए।
मालपुए को खीर या रबड़ी के साथ भी खाया जा सकता है। नही तो आम के आचार के साथ इन पुओं के मजे लीजिये।
कभी कभी मसरूफ जिंदगी में कुछ ऐसा घट जाता है जो सोचने के मजबूर कर देता हे कि क्यों ईश्वर किसी को हर ख़ुशी से महरूम क्यों कर देता हे क्यों ये मासूम बच्चो से उनके माँ, बाप को दूर कर देता है।
एक टीचर की ड्यूटी निभाते हुए बहुत से बच्चों से मिली जिनके जीवन मे ईश्वर से कोई न कोई नाइंसाफी की हुई थी पर आज से बहुत साल पहले दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली पिंकी प्रार्थना में गर्मी से बेहोश होकर गिर पड़ी उसे उठा कर मेडिकल रूम में ले गयी ग्लूकोस वगेरह दिया। फिर घर में फ़ोन कर दू ये सोच कर उठी ही थी पिंकी की आवाज़ से चोंक गयी कह रही थी मेम प्लीज मेरे घर फ़ोन नही करना मुझे घर नही जाना। मै हैरान रह गयी क्यों ? बस मुझे नही जाना घर, मैं यही रहूंगी। अच्छा, मै उसे मेडिकल रूम में छोड़ कर क्लास में आ गयी। पर मन में यही सवाल घूम रहा था कि क्यों पिंकी ने घर जाने को मना कर दिया। तभी राधा बोली मेम आपको पता हे की पिंकी घर से कुछ खा कर नही आती। उसकी मम्मी उसे कुछ खाने को नही देती की स्कूल में मिड डे मील मिलेगा तो वही खा लेना सारा काम करती है घर का ऊपर से मारती भी है उसे। क्यों ? मेरे हैरान प्रश्न पर सब ने हंस कर कहा कि उसकी अपनी मम्मी नही हैं ना .………
अगले दिन से पिंकी मेरे लिए स्पेशल स्टूडेंट हो गयी पढ़ाई में तो अच्छी थी ही वो मेरे थोड़े से प्यार और एक्स्ट्रा अटेंशन ने उसे और निखार दिया। हर कम्पटीशन में पार्ट लेना जीत कर आना और अपने सारे अवार्ड्स मुझे दिखाने को बेताब पिंकी हर घड़ी मेरे आस-पास होती। उसकी उपस्थिति मुझे सुकून देती थी। "आठवी के बाद नही पढ पाऊँगी क्योंकि माँ ने मना कर दिया है", ये शब्द मुझे अंदर तक चीर गए पूछ भी नही पायी कि क्यों ? इतनी होशियार बच्ची इस तरह सौतेली माँ के दुर्व्यवहार के कारण पढ़ नही पायेगी लेकिन मै क्या करूँ नही सोच पा रही थी। पापा को बुला कर बात भी की पर नतीजा सिफर।
ईश्वर से दुआ करती कोई रास्ता दिखाओ मुझे। "पिंकी तुम्हारी मम्मी तुम्हे प्राइवेट पढ़ाई तो करने देंगी ना, मै तुम्हारी पूरी मदद करुँगी"। "पता नही" रुआंसी सी पिंकी बोली। १० वीं की पढ़ाई फिर १२ वीं के पेपर्स प्राइवेट दे कर पूरे जोन में प्रथम आने वाली पिंकी तब तक मेरे कॉन्टेक्ट में थी हर कठिनाई मुझसे शेयर करने वाली पिंकी एक दिन आई और रोते हुए बोली गॉव जा रही हूँ अब कभी नही मिल पाऊँगी। अरे रोते नही अब तुम बड़ी हो गयी हो अब तुम्हे मेरे सहारे की जरूरत नही है अपना रास्ता खुद तलाश करो।
इतने साल बाद न्यूज़ पेपर की हैडलाइन पर नजर टिक गयी यू० पी ० के छोटे से गॉव की पिंकी आई ० ए ० एस ० के एग्जाम में सेलेक्ट हुई थी। मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नही था मेरे पैर जमीन पर नही पड़ रहे थे। पति को ये खुश खबरी सुनाने को फ़ोन उठाया ही था कि वह घन घन बज उठा। पिंकी थी "मेम मैंने आपका सपना पूरा कर दिया। मैंने शादी के बाद भी पढ़ाई नही छोड़ी। इसके लिए ही तो आपने मेरी इतनी मदद की थी ना। मुझे अपनी माँ का सपना पूरा करना था। मैंने सबसे पहले अपनी माँ को बताने के लिए फ़ोन किया। आप मेरी माँ ही हैं ना। आप मेरी माँ ही हैं ना। " ........... और मैं ना जाने क्या सोच रही थी मेरा थोड़ा सा प्यार किसी बच्ची की जिंदगी को इस मुकाम पर ले आएगा।
आजकल न्यूज़ मे यह खबर बार बार आ रही थी की औरंगजेब रोड का नाम बदल कर भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए० पी० जे० अब्दुल कलाम रोड किया जाये ऐसी मांग उठ रही है। शुकवार को नई दिल्ली नगर निगम के उप सभापति श्री करन सिंह तंवर ने कहा कि सदन में औरंगज़ेब रोड का नाम बदल कर पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर करने के लिए सभी ने सर्व सम्मति से प्रस्ताव पारित कर दिया। दिल्ली के मुख्य मंत्री भी एन० डी० एम ० सी०के सदस्य है इस मीटिंग में मौजूद थे। उन्होंने भी ट्वीट कर हर्ष व्यक्त किया।
औरंगज़ेब रोड का ही नाम क्यों चेंज करके उसे रीनेम किया जाये इसके जवाब में अजीब अजीब वक्तव्य आये जिसमे किसी ने औरंगज़ेब को क्रूर शासक बताया इसलिए उसके नाम के बजाय उस रोड को अब्दुल कलाम नाम देना ठीक रहेगा।
१९११ से १९३१ के बीच जब नई दिल्ली की रोड्स एवं पार्क्स को नाम देने के विषय में योजना बनाई तो दिल्ली की ऐतिहासिक सम्पदा को जीवित रखना चाहते थे सो उन्होंने कई लोदी ,तुगलक ,मुग़ल ,हिन्दू ,मंगोल,पठान व् राजपूत लगभग इतिहास के सभी वंशजों जिन्होंने ने भी दिल्ली के इतिहास में कोई योगदान दिया था उनके नाम पर नामकरण किया तो उन्होंने बिना पक्षपात के इंडिया गेट के चारों तरफ की रोड्स को पृथ्वीराज चौहान ,अशोक ,औरंगजेब, शाहजहाँ व् शेर शाह सूरी आदि के नाम पर नाम रखे।
डॉ ए० पी० जे० अब्दुल कलाम हमारे देश की ऐसी शख्सियत है कि उनके नाम पर किसी रोड किसी बिल्डिंग किसी पार्क का नाम रखा जाये तो किसी भी हिंदुस्तानी को एतराज नही होगा किन्तु यदि किसी रोड का नाम बदलने के बजाय किसी महत्वपूर्ण रोड का नामकरण उनके नाम पर किया जाता तो शायद श्रद्धांजलि देने का ये तरीका ज्यादा उपयुक्त रहता। मैं तो कहती हूँ की इस तरीके से तो ज्यादा बेहतर तरीका होता यदि हमारी सरकार देश के गरीब योग्य बच्चों को आगे पढ़ने के लिए कलाम साहेब के नाम पर स्कालरशिप देती। विज्ञानं विषय में महत्वपूर्ण खोज करने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करती या फिर उस मिसाइल मैन को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका ये भी हो सकता है कि हमारी अगली मिसाइल का नाम उनके नाम पर हो।
हर चीज पर राजनीतिक सियासत करने के बजाय यदि हमारे सियासतदान उन्हें सच्चे मन से याद करने के लिए कोई कोई स्कूल जहाँ विज्ञानं की खोजों के लिए उत्तम लैब्स जो आधुनिक उपकरणों से लैस हो खोलें तथा वहाँ बच्चे अपनी योग्यता के आधार पर एडमिशन पा सकें तो डॉ ० कलाम की आत्मा ज्यादा प्रसन्न होगी।
डॉ० कलाम हमारे देश के गौरव है,थे और रहेंगे ओ सियासतदानों उनके नाम पर राजनीति मत करो वो तो ऐसी शख्सियत थे जो राजनीति के गहरे कुए से भी बेदाग निकल कर आये थे।
आज स्कूल से घर आकर टीवी चलाया तो ज़िंदगी चैनल पर शुक्रिया प्रोग्राम आ रहा था। प्रोग्राम मे एक पोती अपने दादा और दादी का शुक्रिया करते हुए "फलेश-मॊब" एक्ट करती है। उसके अनुसार उसके दादा और दादी ने उसे जीवन में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी इसलिए वो उनका शुक्रिया कर रही है।
मुझे उसी पल यह एहसास हुआ कि मुझे भी अपनी जिंदगी में इस मुकाम पर लाने वाले मेरे पति का मैंने कभी शुक्रिया नहीं किया। मैं आज याद करती हूँ ३२ साल पहले १९ वर्ष की उम्र में जब पढ़ाई करते-करते ही मम्मी -डैडी ने विवाह करके रुखसत कर दिया था, उस वक्त मेरा हाथ थामा मेरे पति ने। नया घर, नए लोग, सब कुछ नया - ना अपने घर जैसा माहौल, ना खानपान - सब कुछ बदला बदला सा था।
ऐसे समय में इन्होने अपने परिवार के नियम-रिवाज़ सबसे मेरा परिचय करवाया। कभी यह एहसास ही नही होने दिया कि मैं इस घर में नई हूँ। मेरे परिवार को अपना परिवार मान कर हर काम हर अवसर पर मदद की। इन्होने कभी मुझे किसी चीज़ के लिए नही रोका बल्कि आगे बढ़ कर मेरी मदद की। मेरी पढाई पूरी करवाई बी० एड ० करवाया तथा मेरे जैसी अंतर्मुखी , सकुचाई सी लड़की को टीचर्स रिक्रूटमेंट एग्जाम दिलवा कर जॉब में लगवाया एवं आत्मनिर्भर बनाया। किस मौके पर हमें किस तरह से पेश आना है, किसी मुश्किल परिस्थिति पर कैसे रिएक्ट करना है सब मैंने अपने पति से सीखा।
मेरे व्यक्तित्व का जो भी पहलु आज सबके सामने है, सब इनकी ही देन है। आपके हर सपोर्ट के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया खन्ना साहिब।
सारा दिन बिस्तर पर बैठे रहो कुछ न करना हो सोच कर बड़ा मज़ा आता है ना । पर मेरा यकीन मानिये कि अगर आपको जबरदस्ती बेड पर बिठा दिया जाये कि आपको कुछ नही करना सिर्फ रेस्ट करना है ऐसा लगता है किसी ने सज़ा देदी है। बिल्कुल ऐसा आजकल मेरे साथ चल रहा है।
दो दिन पहले क्लास लेने जाने की जल्दी में टेबल से पैर टकरा गया ऐसा लगा कि पूरा स्टाफ रूम गोल गोल घूम गया उस समय तो क्लास की टेंशन में सीढियाँ चढ़ती हुई ऊपर चली भी गयी। बाद वाली भी सारी क्लासेज लेकर घर आने तक ये एहसास तो था कि पैर में थोड़ा सा दर्द है पर घर आकर जब आराम करने को मिला तो लगा कि दर्द नार्मल से थोड़ा ज्यादा है। शाम तक तो पैर सूज भी गया और दर्द भी बढ़ गया तो समझ आ गया की कुछ गड़बड़ हो गयी। इनके ऑफिस से घर आने पर बताने पर जो कुछ डांट पड़ने वाली है उसके बारे में सोच कर ही डर लग रहा था। वही हुआ तुम देख कर क्यों नही चल सकती हर समय जल्दी तुम्हे ही क्यों होती होती है अब भुगतो थोड़ा ध्यान से काम कर लो तो क्या बिगड़ जाता हे तुम्हारा ……। सर झुकाये अपराधी बच्चे की तरह डाँट सुन रही थी। जब ये शांत हुए तो अब चलें डॉक्टर के पास पूछा तो ये गुस्से में गाड़ी की चाबी ले कर बाहर निकल गए।
एक्सरे से ऊँगली मै हेयर लाइन फ्रैक्चर कन्फर्म हुआ तो डाक्टर साहेब ने कहा प्लास्टर नही हो सकता। बैंडेज बांध दी साथ ही हिदायत दी कि ५ दिन टोटल बेडरेस्ट पैर को लटकाना नही है। बस साहेब जी वो छोटी सी मेरी बेटी जो पानी का गिलास भर कर भी खुद नही पी सकती थी एकदम मेरा रूप धारण करके "बैठ जाओ, उठना नही। आपके बिना भी सब काम हो सकता है,बस आराम करो" आदि आदि बोल कर काम पर लग गयी। मन एकदम भर आया कि हम यही सोचते रहते है कि हमारी परवाह किसे है पर यहां तो नज़ारा ही अलग था दोनों पापा और बेटी खाना बनाना पानी भरना दूध लाना सारे काम ऐसे कर रहे थे कि कहीं मैं किसी काम के लिए उठ न जाऊँ।
थोड़ी देर तक तो अच्छा लगा फिर थोड़ा सा उठ कर कुछ करने की कोशिश पर दोनों का झिड़क देना बैठी रहो रहो सजा जैसा लगने लगा। ऐसा लगा कितनी मजबूर हो गयी हूँ मैं। सारा दिन बिस्तर पर बैठी बस यही सोच रही हूँ कि भाई हम तो काम करते हुए ही भले। ईश्वर अगली बार ये ध्यान रखना की मुझे बैठे रहने से बहुत नफरत है प्लीज मेरे लिए ये सजा न मुकर्रर की जाये। मैं तो दौड़ते भागते शोर मचाते जल्दी जल्दी करो "ये क्या है, वो क्या है" अपनी टैग लाइन्स के साथ जीना चाहती हूँ।
जो कुछ भी हमारे पास हो वो सदा कम ही लगता हैं। नंगे पाॅव चलने वाला चप्पल की आस करता है , चप्पल जिसके पास है वो साइकिल होती तो मजे हो जाते , साइकिल पा जाने पर मोपेड या मोटर साइकिल की आस करने लगता है। मोटर साइकिल मिलने पर कार की तमन्ना जोर पकड़ने लगती है अर्थात मनुष्य हमेशा जो कुछ भी उसके पास है वो कम है दूसरे के पास ज्यादा है से ही दुःखी रहते हैं ।
जिंदगी में अगर कुछ गलत हो सकता है तो वो जरूर होगा यानि कहीं ये न हो जाये हमारे मन में जो विचार आ जाता है वही अक्सर होता है।
मौन रह कर अक्सर बडी बहस जीती जा सकती है।
वाणी में बड़ी शक्ति होती है कड़वा बोलने वाला अपना शहद नही बेचपाता और मीठा बोलने वाला मिर्ची भी बेच जाता है।
संघर्ष व चुनौतियां इंसान को प्रखर एवं मजबूत बनाती है उसकी प्रतिभा को निखारती है।
ईश्वर ने कोई मुश्किल ऐसी नही बनाई जिसका हल न बनाया हो बिलकुल ऐसे जैसे कोई ताला नही बनता चाबी के बिना।
मुस्करा कर सारा जहाँ जीता जा सकता है ये वो मेकअप है जो बिना पैसे खर्च किये आपकी फेसवेल्यु बड़ा देती है।
ईश्वर उनकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करना चाहते है।
अपनी जरूरतों के लिए आवाज़ उठानी पड़ती है बिना रोये तो माँ भी दूध नही देती।
जिंदगी एक फलसफा है दोस्तों गर समझ आ गया तो जीत वरना हार का सिलसिला है दोस्तों।
विधि:- एक गहरी प्लेट में १ कटोरी बेसन ,२ बड़े चम्मच दही ,२ चम्मच रिफाइंड तेल थोड़ी सी लाल मिर्च चुटकी भर अजवाइन व नमक स्वादानुसार डाल लें। प्याज को महीन कद्दूकस करके इसमें मिला लें। इस मिक्सचर को टाइट आटे जैसा गूँथ लें।
गूंथे हुए बेसन की पतली पतली लम्बी डंडी की शेप में बेल लें।
अब एक बर्तन में पानी उबलने रखें। जब पानी उबलने लगे तो उसमे बेसन की लम्बे गोल टुकड़े दाल कर ३-४ मिनट तक उबलने दें।
जब बेसन का रंग बदल के हल्का हो जाये तो निकल लें फिर ठन्डे होने पर छोटे टुकड़ों में काट लें।
करी बनाने की विधि:- करी बनाने के लिए प्याज अदरक व् लहसुन का पेस्ट बना लें.कड़ाही में घी गर्म करके जीरा डालें ,जीरा चटकने पर इसमें प्याज ,अदरक व् लहसुन का पेस्ट डाल कर भूनें। इसके भुनने के बाद इसमें टमाटर की प्यूरी डाल कर भूनें। फिर इसमें मिर्च ,हल्दी धनिया पाउडर व् नमक डाल कर २ मिनट तक भूनें कि मसाला घी छोड़ जाए।
फिर इस मसाले में गट्टे डाल कर २ -३ मिनट तक भूने फिर इसमें पानी डालें ( जितनी करी आप रखना चाहें ) उबाल आने तक रुकें फिर सब्जी को ढक कर धीमी आंच पर ५ मिनट तक पकाएं। अंत में सूखी मेथी डाल कर ढकें।
लीजिए तैयार है लज़ीज़ गट्टे की सब्जी। डोंगे में डाल कर ऊपर से हरा धनिया व् गर्म मसाला डाल कर लच्छेदार परांठे या तंदूर की रोटी के साथ परोसें।